18-23 फ़रवरी, 1946 – ‘नौसेना विद्रोह’ भारतीय इतिहास की गौरवमयी गाथा

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नौसेना विद्रोह -अरविन्द सिंह

स्वाधीनता आन्दोलन का पूरा इतिहास जनता की ऐसी शौर्यपूर्ण घटनाओं से भी भरा पड़ा है जिनपर हम फ़क्र कर सकते हैं और आगामी संघर्षों के लिए प्रेरणा ले सकते हैं। ये ज्वलन्त घटनाएँ तिलक पर चले मुकदमे के समय भारत के मज़दूरों की पहली राजनीतिक हड़ताल, गदर आन्दोलन, एच.एस.आर.ए. (भगतसिंह और उनके साथियों का संगठन) मुम्बई-कलकत्ते से लेकर कानपुर तक के मज़दूरों के जुझारू संघर्षों, आज़ाद हिन्द फौज पर मुकदमे के समय उठे जनसंघर्षों, नौसेना विद्रोह आदि से होती हुई तेभागा-पुनप्रा-वायलार और तेलंगाना के जबर्दस्त जुझारू किसान संघर्षों तक फैली हुई हैं। आज भले ही बिकाऊ कार्पोरेट मीडिया के घटाघोप में ये घटनाएँ विस्मृति के गर्त में समा गयी हों, लेकिन इस देश की मेहनतकश आवाम के लिए अपने शूरवीरों की कुर्बानियों की याददिहानी बेहद ज़रूरी है। शाही नौसेना का विद्रोह हमारे स्वाधीनता संग्राम की एक महत्वपूर्ण घटना थी। इसके इतिहास से पता चलता है कि वास्तविक संघर्ष संगठित होने पर अंग्रेजों और देशी बुर्जुआ नेताओं की धुकधुकी कैसे बढ़ जाती थी। प्रख्यात इतिहासकार सुमित सरकार के अनुसार ‘‘आज़ाद हिन्द फौज के जवानों के ठीक विपरीत शाही नौसेना के इन नाविकों को कभी राष्ट्रीय नायकों जैसा सम्मान नहीं मिला, यद्यपि उनके कारनामों में कुछ अर्थों में आज़ाद हिन्द फ़ौज के फौजियों से कहीं अधिक ख़तरा था। जापानियों के युद्धबन्दी शिविर की कठिनाई भरी ज़िन्दगी जीने से आज़ाद हिन्द फौज में भरती होना कहीं बेहतर था।’’

नौसेना विद्रोह का घटनाक्रम कुछ इस प्रकार से था – द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण नौसेना का विस्तार किये जाने के फलस्वरूप देश के हर कोने से इसमें जवान भरती हुए थे। पूरे विश्व की उथल-पुथल की घटनाओं के साथ ही देश में आन्तरिक जनआन्दोलन का प्रभाव भी हर किसी जगह की तरह नौसेना के अन्दर भी देखा जा सकता था। औपनिवेशिक ग़ुलामी, ग़ैर-बराबरी और नस्ली भेदभाव से नौसेना भी अछूती नहीं थी। इस संघर्ष की शुरुआत 18 फ़रवरी को घटिया भोजन, भेदभाव और नस्ली अपमान के विरोध में नाविकों द्वारा की गयी भूख हड़ताल के रूप में हुई। ये नाविक सिगनल्स प्रशिक्षण प्रतिष्ठान ‘तलवार’ के नाविक थे।  19 फ़रवरी को हड़ताल कैसल और फोर्ट बैरकों सहित बम्बई बन्दरगाह के 22 समुद्री जहाजों में फैल गयी थी। अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति को धत्ता बताते हुए समुद्री बेड़े के मस्तूलों पर तिरंगे, चाँद और हसिये-हथौड़े वाले झण्डे एकसाथ लहराते दिखे। नाविकों ने जल्द ही चुनाव के माध्यम से एक नौसेना केन्द्रीय हड़ताल समिति का गठन किया जिसके प्रमुख एम.एस. ख़ान थे। भूख हड़ताल की माँगे बेहतर भोजन तथा अंग्रेज और भारतीय नाविकों के लिए समान वेतन से जुड़ी माँगें थीं। साथ ही, आज़ाद हिन्द फौज के सैनिकों की रिहाई, अन्य राजनीतिक कैदियों की रिहाई तथा इण्डोनेशिया से सैनिकों को वापस बुलाये जाने की राजनीतिक माँगे भी इनके माँगपत्रक में शामिल थीं। इससे नौसैनिकों की राष्ट्रीय चेतना के स्तर को समझा जा सकता है।

शान्तिपूर्ण हड़ताल और पूर्ण विद्रोह की पेशोपेश का शिकार होकर, आखि़रकार 20 फ़रवरी को नौसैनिकों ने अपने-अपने जहाज पर लौट जाने के आदेश का पालन किया। वहाँ पर सेना के गार्डों ने उन्हें घेर लिया। 21 फ़रवरी को जब कैसल बैरकों में नौसैनिकों ने घेरा तोड़ने का  प्रयास किया तो लड़ाई छिड़ गयी। पर्याप्त गोला-बारूद जहाज से मिल ही रहा था। एडमिरल गॉडफ्रे द्वारा नौसेना को विमान भेजकर नष्ट करने की धमकी दी गयी। दोपहर बाद लोगों की भारी भीड़ नौसैनिकों से स्नेह और एकता को प्रदर्शित करते हुए गेटवे ऑफ इण्डिया पर जुट गयी। इनमें बड़ी संख्या में गोदी मज़दूर, नागरिक और दुकानदार शामिल थे। काफ़ी लोगों के पास नौसैनिकों के लिए भोजन भी था। 22 फ़रवरी तक हड़ताल देश भर के नौसेना केन्द्रों और समुद्र में खड़े जहाजों तक फैल गयी। अपनी चरम अवस्था के समय हड़ताल में 78 जहाज और 20 तटीय प्रतिष्ठान शामिल थे। लगभग 20,000 नाविकों ने इन कार्रवाइयों में हिस्सेदारी की। हिन्दू-मुसलमान मेहनतकश मज़दूरों, विद्यार्थियों और नागरिकों की पुलिस व सेना के साथ हिंसक झडपें हुईं। इनमें लोगों ने नौसैनिकों के प्रति अपना हार्दिक समर्थन प्रकट किया। 22 फ़रवरी को नाविकों के समर्थन में 3,00,000 मज़दूर काम पर नहीं गये। सड़कों पर बैरिकेड खड़े करके जनता ने पुलिस और सेना से लोहा लिया। यह स्थिति दो दिनों तक बनी रही। ‘‘कानून व्यवस्था को बहाल” करने  के नाम पर अलग से दो सैनिक टुकड़ियाँ लगानी पड़ीं। सरकारी आकलन के मुताबिक ही 228 लोग मारे गए और 1,046 घायल हुए। जबकि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है।

विद्रोह की समाप्ति 23 फ़रवरी को नाविकों द्वारा समर्पण करने के रूप में हुई। सरदार पटेल ने जिन्ना की मदद से अंग्रेजों और नाविकों का बिचौलिया बनते हुए उनसे सर्मपण करवाया। आश्वासन दिया गया कि उन्हें अंग्रेजी अन्याय का शिकार नहीं होने दिया जायेगा। किन्तु ये आश्वासन जल्द ही भुला दिये गये। यह तो थी विद्रोह की घटना। अब जरा अपने राष्ट्रीय ‘नेताओं’ के बयानों को भी देख लेते हैं। हमें एक तरफ जहाँ संघर्षों के प्रति जनता की एकजुटता दिखायी देती है, वहीं हमारे ‘नेताओं’ का रवैया काफ़ी अलहदा था। पटेल ने 1 मार्च 1946 को एक कांग्रेसी नेता को लिखा, ‘‘सेना में अनुशासन को छोड़ा नहीं जा सकता… स्वतन्त्र भारत में भी हमें सेना की आवश्यकता होगी। जवाहर लाल नेहरू भी इस बात के कायल थे कि ‘‘हिंसा के उछश्रृंखल उद्रेक को रोकने की आवश्यकता है।’’ गाँधी जी ने भी ‘बुरा और अशोभनीय’ उदाहरण क़ायम करने के लिए नौसैनिकों की निन्दा की व उन्होंने ‘‘शिक्षा’’ दी कि यदि नाविकों को कोई शिक़ायत है, तो वे चुपचाप नौकरी छोड़ सकते हैं। गाँधी जी ने यह भी कहा, कि ‘‘हिंसात्मक कार्रवाईयों के लिए हिन्दुओं और मुसलमानों का एक होना एक अपवित्र बात है…’’ 30 मई, 1946 को अंग्रेज वायसराय वेवेल ने अपनी निजी टिप्पणी में लिखा था, ‘‘ हमें हर क़ीमत पर हिन्दुओं और मुसलमानों से एकसाथ उलझने से बचना चाहिए।’’

इस प्रकार हम देखते हैं कि कैसे वर्गीय एकजुटता और वास्तविक संघर्ष अंग्रेजों के साथ-साथ ‘राष्ट्रीय नेताओं’ के मन में भी घबराहट पैदा कर देते थे। नौसेना की केन्द्रीय हड़ताल समिति का अन्तिम सन्देश ये है: ‘‘हमारी हड़ताल हमारे राष्ट्र के जीवन की एक ऐतिहासिक घटना रही है। पहली बार सेना के जवानों और आम आदमी का ख़ून सड़कों पर एकसाथ, एक लक्ष्य के लिए बहा। हम फौजी इसे कभी नहीं भूलेंगे। हम यह भी जानते हैं कि हमारे भाई-बहन भी इसे नहीं भूलेंगे। हमारी महान जनता ज़िन्दाबाद! जयहिन्द!’’

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