ख़ामोशी में कोई आहट न खोजे राजनीतिक तूफ़ान का इंतजार करें

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बाबूलाल

आप किसी ख़ामोशी में कोई आहट ना खोजिये। सूत्र कहते हैं कि भाजपा बाबूलाल मरांडी जी को पद देकर उनकी पार्टी सहित मिला अपनी डूबते नैया को बचाने भर का यह प्रयास भर हो सकता है। लकीर तो बड़ी लग रही है, लेकिन इसके अक्स तले जो सवाल उभर के सामने आने वाले है वह बाबूलाल जी के व्यक्तित्व पर ऐतिहासिक ग्रहण के समान होगा, जो उन्हें राजनीति के अखाड़े में छुटभैये नेताओं की श्रेणी में ला खड़ा करेगा और वर्तमान मुख्यमंत्री को झारखंड की राजनीति में ना केवल अलग खड़ा करेगा बल्कि विचारधारा के कसौटी पर उनका कद बड़ा कर देगा।

महज चंद दिनों पहले जनता की नुमाइंदगी कर रहे नेता जी ख़ामोशीझारखंड के अंधेरे तले लोकतंत्र का उजियारा खोजने चले थे। जनता ने इन्हें मायूस भी नहीं किया, वर्षों के सूखी ज़मीन भिंगोया और अपनी बेहतरी के लिए सदन के दहलीज़ तक इन्हें पहुंचाया। मौजूदा वक्त में उसी लोकतंत्र में जनता को उनके विश्वास के एवज में सियासत का नया पाठ पढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। जो उन्हें उसी परिस्थिति में ला खडा करती है जहाँ न्याय और समानता शब्द ग़ायब रहे, जिसके मायने सत्ता के विरोध में उठे स्वर फिर से कुचलने सरीखे है।

इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि झारखंड की करवट लेते राजनीति ने बाबूलाल जी को भाजपा के विरुद्ध जा वोट दिया है। ऐसे में अगर बाबूलाल जी अगर भाजपा मे शामिल होते हैं तो एक तरफ राज्य में कई गंभीर सवालों को जन्म देगा और दूसरी तरफ कई सवालों के जवाब। जैसे भाजपा के बी टीम होने के आरोप पर मुहर लग जायेगी। आजीवन संघी होने के आरोप जो अब तक खारिज करते आये थे पर भी मुहर लग जाएगी। साथ ही इनके व्यक्तित्व पर जो गंभीर सवाल होंगे वह यह है कि अब तक इन्होंने झारखंड के आदिवासी-मूलवासी के भावनाओं से केवल खिलवाड़ किया।

मसलन, इस ख़ामोशी में कोई आहट न खोजते हुए राजनीतिक तूफ़ान का इंतजार कीजिये, जिसमे एक बार फिर भाजपा के संघीय विचारधारा झारखंडी मुखौटे की आड़ में झारखंडी विचारधारा को छलने में कामयाब होगा।      

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