‘शिक्षक कभी गुंडा नहीं हो सकता है’

शिक्षक कभी गुंडा नहीं हो सकता है, रघुबर दास जितनी जल्दी समझ लें अच्छा होगा

Share on facebook
Share on twitter
Share on linkedin
Share on telegram
Share on whatsapp

रघुबर दास जितनी जल्दी समझ लें कि शिक्षक कभी गुंडा नहीं हो सकता है

स्वर्गीय श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी ने प्रधानमंत्री रहते हुए सर्व शिक्षा अभियान शुरू किया था। इसी के अंतर्गत पारा शिक्षकों की बहाली की गयी थी। नियुक्ति के समय ही सरकार द्वारा ये आश्वासन दिया गया था कि समय के साथ-साथ पारा शिक्षकों को स्थायी किया जाएगा। धीरे धीरे सभी राज्यों, यहाँ तक बिहार जैसे गरीब राज्य ने इन्हें स्थायी कर दिया है या फिर इनके मानदेय में वृद्धि कर दी है। इन सब से बेपरवाह झारखंड की भाजपा सरकार राज्य के पारा शिक्षकों को लगातार आश्वासन देकर अपनी बातों से मुकरती रही। नवम्बर में मुख्यमंत्री कार्यालय ने इनकी समस्याओं का समाधान देने को आश्वस्त किया था, परन्तु सरकार के अड़ियल रवैये के कारण अपनी मांग को रखने के लिए नहीं चाहते हुए भी 15 नवम्बर जैसे पावन मौके को चुनना पड़ा।

इन सब के बीच अडानी-अम्बानी के आगे शाष्टांग प्रणाम करने वाली भाजपा सरकार नहीं झुकने का दंभ भर रही है। झारखंड के मुख्यमंत्री महोदय लगातार एक तानाशाह की तरह पारा शिक्षकों के आन्दोलन को कुचलने के लिए बर्बरता से पुलिसिया डंडों का इस्तेमाल करवा रहे हैं। इस पूरी घटना पर अफ़सोस जताना तो दूर महोदय लगातार आंदोलनरत शिक्षकों के लिए गुंडे, मवाली जैसे अलोकतांत्रिक शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं। कल उन्होंने कहा था – “ये पूरा उपद्रवी पारा शिक्षकों का समूह, शिक्षक न होकर पत्थरबाज और गुंडागर्दी करने वाले लोकतंत्र के दुश्मन हो गये हैं। लेकिन इस सरकार को, रघुवर दास को कोई झुका नहीं सकता, पत्थरबाजों गुंडागर्दी करोगे, होटवार जेल जाओगे, इतनी दफाएं लगेगी न कि बेल भरने में आन्दोलन का बुखार उतर जायेगा”। सरकार जनता की गाढ़ी कमाई पत्थरबाज शिक्षक का वेतन बढाने का काम नहीं करेगी।“लगता है बहुत दफाओं का सामना कर रहे मुख्यमंत्री जी को ग़लतफ़हमी हो गयी है कि दफा लगाने वाला पुलिस तंत्र उनकी जेब है एवं अर्जी सुनने वाला अदालत उनके ही इशारे पर ही काम करता है।

वास्तव में किसी भी संस्कृति में आदमी और जानवर के बीच के फर्क को स्थापित करने वाले शिक्षक गुंडे हो ही नहीं सकते। झारखंडी संस्कृति में एक समृद्धशाली गुरुपरंपरा का स्थान रहा है। विभिन्न स्टेजों से खुद को जनता का दास एवं मजदूर बताने वाले रघुबर दास जी भूल जाते हैं कि विश्व के तमाम देशों में अब समान काम समान वेतन की बात हो रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस विषय पर बिहार के पारा शिक्षकों द्वारा किये गए मुकदमे में राज्य को निर्देश देते हुए इन विषंगतियों को दूर करने को कहा है। आखिर पढ़ाने के लिए ही किसी को 50-60 हजार और किसी को 8-9 हजार का मानदेय देना कहाँ से जायज है। समान काम के लिए समान वेतन के भुगतान की मांग कर रहे पारा शिक्षक लोकतंत्र के दुश्मन कैसे हो गए? सरकार को इस मुद्दे पर संजीदगी दिखानी चाहिए। यह विरोध सिर्फ पारा शिक्षकों का नहीं है बल्कि उन सभी श्रमिकों की आवाज है जिन्हें समान काम के लिए समान मानदेय से दूर रखा गया है। चाहे वो आंगनबाड़ी सेविका हों, रसोईया दीदी हों, दस हजार के वेतन पर अनुबंधित युवा पुलिसकर्मी हों या होमगार्ड के जवान सभी की हकमारी इस पोस्टरबाज सरकार के द्वारा किया जा रहा है।

फिलहाल रघुबर दास को राष्ट्रकवि दिनकर की पंक्ति:-

“समय के रथ का घर्घर नाद सुनो,

सिंहासन खाली करो कि जनता आने वाली है”

समझना बहुत जरूरी है। क्योंकि जिस सत्ता के नशे में चूर हमारे मुख्यमंत्री महोदय लड़खड़ा रहे हैं वो झारखंडवासियों की ही देन है। शिक्षकों को जमानत लेने में बुखार लगने की बात कह के हतोत्साहित करने वाले साहब भूल गए हैं कि समय आने पर सामान्य से दिखने वाले लोगों ने अनेकानेक निरंकुश सत्ताधीशों की जमानत जब्त करवा बीमार बना चुकी है।

Share on facebook
Share on twitter
Share on linkedin
Share on telegram
Share on whatsapp

This Post Has One Comment

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Related Posts