कुरमी बहुल क्षेत्र (सिल्ली ) में भी आखिर सुदेश महतो क्यों हारते हैं !

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कुरमी बहुल क्षेत्र

सुदेश की कुरमी बहुल क्षेत्र सिल्ली उपचुनाव में हार उनकी दोहरी नीति के कारण हुई  पीसी महतो (चक्रधरपुर) की कलम से

झारखण्ड में हुए इस वर्ष सिल्ली उपचुनाव में सुदेश महतो की हार के कई मायने हैं। इन दिनों सुदेश महतो की आजसू (पार्टी) झारखंड में भाजपा सरकार की सहयोगी दल है। हालांकि भाजपा की सरकार सुदेश महतो के बगैर भी चल सकती है। चूँकि इनका गठबंधन चुनाव पूर्व का था और भविष्य को ध्यान में रखते हुए इसलिए भाजपा ने आजसू पार्टी के साथ गठबंधन धर्म निभाया और इस दल के कोटे से चंद्र प्रकाश चौधरी झारखंड सरकार में मंत्री पद दिया।

2014 के लोकसभा चुनाव में सुदेश महतो रांची लोकसभा क्षेत्र से प्रत्याशी के रूप में चुनाव लडे थे। तथाकथित मोदी लहर के आगे इनकी एक ना चली और बुरी तरह इस चुनाव में भी हार गए। साथ ही उसी वर्ष नवंबरदिसंबर में हुए विधानसभा चुनाव में सिल्ली विधानसभा क्षेत्र से चौथे टर्म के लिए फाइट में भी सुदेश महतो की करारी हार हुई। इनके हार का मुख्य कारण एंटी इनकंबेंसी माना जाता है।

सिल्ली मूल रूप से कुरमी बहुल क्षेत्र है। इस विधानसभा क्षेत्र के कुल मतदाताओं का लगभग 80 प्रतिशत मतदाता इन्हीं के बिरादरी से आते हैं। लिहाजा इन के लिए यह सुरक्षित सीट माना जाता रहा है, फिर भी यहाँ की जनता ने उपचुनाव में इनका साथ नहीं दिया।

हार का कई मुख्य कारणों में से एक कारण गलत स्थानीय नीति का समर्थन करना भी बताया जाता है, जिसे रघुवर दास ने बाहरिओं को अधिक लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से बनाया है। इस गलत स्थानीय नीति ने झारखंड में सदियों बसने वाले कुरमी बिरादरी को 10-15 साल से रह रहे बाहरिओं के बराबर लाकर खड़ा कर दिया। कुरमी समुदाय को झारखंड सरकार के इस गलत नीति से अंदर ही अंदर काफी खुन्नस है। इसी वजह से कुरमी बिरादरी ने सुदेश महतो को अपेक्षिक सहयोग नहीं किया।

झारखंड में कुरमियो का सबसे बड़ा मुद्दा (एसटी इन्क्लुसन) ST inclusion का है। लेकिन राज्य हित के नीतिगत मामलों में भी कुरमी बिरादरी काफी सजग है, यह अलग बात है कि कुरमी समाज के लोग आमतौर पर सड़कों पर विरोध जताने नहीं उतरते, लेकिन ऐसे मामलों का विरोध करने हेतु चुनाव को अपना हथियार जरूर बना लेते हैं। सुदेश महतो का सत्ता में रहते हुए सत्ता का विरोध करने वाले फार्मूला को सिल्ली की जनता ने सिरे से नकार दिया। उनके दोहरे चरित्र ने उन्हें हार के मुंह में ढकेल दिया। किसी भी राज्य का स्थानीय नीति उस राज्य के स्वाभिमान से जुड़ा होता है, लेकिन झारखंड में जो स्थानीय नीति परिभाषित की गई है, वह यहां के आदिवासी मूलवासियों के स्वाभिमान के विरुद्ध परिभाषित है। जिसका समर्थन सुदेश महतो सत्ता सुख के लिए मजबूरी में कर रहे हैं।

लाबोलुवाब यह है कि केवल कुरमी लीडरशिप से कुरमियों का समर्थन पाना आज के तारीख में मुमकिन नहीं है। कुरमियों को एक स्थानीय के तौर पर मिलने वाले हरेक नीतिगत मामलों में सकारात्मक हस्तक्षेप भी जरूरी है, जो सुदेश महतो न कर पा रहे हैं और न ही करने की उनमें नियत ही दिखती है ।

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