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विस्थापन झारखंडी आदिवासी-मूलवासी का पर्याय !

झारखंडी आदिवासी-मूलवासी का विस्थापन

दशक, 1990 के आरम्भ से झारखण्ड राज्य (2001 के पूर्व बिहार) के नीतिगत ढाँचे में आये नवउदारवादी बदलाव के बाद से राज्य में प्रायोजित हिंसा बढ़ने से देश की अधिकांश आदिवासी-मूलवासी आबादी भीषण ग़रीबी के प्रभाव में रसातलिय जीवन जीने को अभिशप्त हैं। आदिवासियों-मूलवासियों की जल, जंगल, जमीन, नदियों, चरागाह, …

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बेरोज़गारी से त्रस्त झारखंडी युवा आत्महत्या को मजबूर

बेरोज़गारी के आलम

बेरोज़गारी के आलम में छात्र कर रहे हैं आत्महत्या  यदि सरकारी आँकड़ों की ही माने तो 2014 से 2016 के बीच देश के 26 हज़ार 500 युवाओं ने आत्महत्या कर ली। वैश्विक दौर के इस परिवेश में देश में 20 की उम्र से लेकर 30-35 वर्ष के नौजवान डिप्रेशन की बीमारी …

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स्थानीय लघु उद्योगों को दरकिनार करती रघुवर सरकार

स्थानीय लघु उद्योगों को दरकिनार करती रघुवर सरकार

स्थानीय लघु उद्योगों से दूरी बनाती रघुवर सरकार सवाल वाकई अबूझ है कि यदि मुख्यमंत्री पद के किसी भी दावेदार को मुख्यमंत्री बना दिया जाये तो वह करेगा क्या? यहां ये सवाल भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जो मौजूदा मुख्यमंत्री हैं उन्होंने ऐसा किया ही क्या है जिससे लगे की उन्हें …

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रघुवर सरकार ने आदिवासी बच्चों के छात्रवृति रोकी

रघुवर दास जी ने अपने जनसभा कार्यक्रम में बड़ी चालाकी से अपनी नाकामियां छुपाते हुए सभी नाकामियों का ठीकरा दबंगता पूर्वक अधिकारियों के सर फोड़ राज्य की जनता को अपनी सरकार का दामन साफ़ बता दिया है। परन्तु इस प्रकार के कार्यकर्मों का आयोजन कर वे अपना पल्ला झाड़कर यहाँ …

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सरकार की दमनकारी नीतियों कर खिलाफ झारखंडियों का हल्ला बोल

आदिवासी-दलितों, अल्‍पसंख्‍यकों, वामपंथी कार्यकर्ताओं पर सत्‍ता द्वारा दमन की घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं। एक ओर जो कोई भी रघुवर सरकार और भाजपा के ख़तरनाक एजेण्‍डे के विरोध में आवाज़ बुलंद करने का प्रयास करते हैं  उसे फ़र्ज़ी मुक़दमे के अंतर्गत जेल में डालना, उस पर भीड़ को उकसाकर हमले …

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खिलाड़ी और खेल के प्रति सरकार का उदासीन रवैया क्यों?

खेल - खिलाड़ी

इस सन्दर्भ में नाम न छापने के अनुरोध कर कुछ खिलाड़ी अपना दुःख बयाँ करते हुए ये बताने से नहीं चुके कि झारखंड में फुटबॉल के खेल में सिर्फ खानापूर्ति हो रही है।

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धनपशुओं के लिए हरमू नदी साबित हुई दुधारू गाय

नगर निगम के प्रस्तावित प्लान में कई खामियां है, जैसे मात्र 7 नालियों को ही सीवरेज से जोड़ा जाना है और 82 नालों को ऐसे ही छोड़ा दिया गया है। भारत सरकार की एजेंसी नेशनल इंवायरमेंटल इंजीनियर्स रिसर्च इंस्टीट्यूट (नीरि) के सर्वे में 82 नालियों को चिन्हित किया गया है।

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हम भारत के लोग …?

अशोभनीय टिप्पणी को लेकर समाज में हफ्तों चर्चाएं हो सकती हैं तो एक लोकतांत्रिक देश में 72 वें स्वतंत्र दिवस के महज चंद दिनों पहले संविधान की प्रतियां जला दी गई और उसपर सरकारों का या प्रधान मंत्री के लालकिले के प्राचीर से दिए गए भाषण में कोई पक्ष तो छोड़िये जिक्र तक ना होना, इसे कैसे देखा जाए या क्या इशारा करती है?

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पाबन्दियों और कानूनी शब्दाडम्बरों के मायाजाल से जकड़ा 72वां  स्वतंत्रता उत्सव

इस प्रकार तत्कालीन सरकार द्वारा संशोधित मौजूद मूलभूत अधिकार बेहद सीमित हैं और जनता को जो कुछ अधिकार दिये भी गये हैं उनको भी तमाम शर्तों, पाबन्दियों और कानूनी शब्दाडम्बरों के मायाजाल से जकड़ कर प्रभावहीन बना दिया गया है।

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सुदेश जी राज्य विकास परिषद के प्रति अब तक गंभीर नहीं

किसी प्रदेश का विकास सिर्फ बड़े लॉंन्चिंग व टार्गेट बनाने से नहीं होता, जब तक एक्शन प्लान तैयार न हो। सपना देखना अच्छी बात है और सभी को देखना भी चाहिए, पर हमारे पैर हमेशा जमीन पर रहने चाहिए।”

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