मोदी सरकार द्वारा रची गयी बदलाव का इवेंट

क्या विफलताओं को छुपाने के लिए मोदी सरकार द्वारा रची गयी बदलाव का इवेंट?

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क्या विफलताओं के जवाबदेही से बचने के लिए मोदी सरकार द्वारा रची गयी मंत्रिमंडल बदलाव का बड़ा इवेंट?

1975 में लगाई गई इमरजेंसी वाकई डरावनी रही होगी. नागरिक अधिकार छीन लिए गए थे विरोध करने वाला विपक्ष जैसे सलाखों में था. राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं के 19 महीने जेल में कटे. उस रात प्रमुख अखबारों की बिजली काट दी गई और लादी गई सेंसरशिप ने अभिव्यक्ति की आज़ादी के मायने ही बदल दिए थे. वाकई भारतीय लोकतंत्र के लिए 19 महीने की लंबी रात ही तो थी.

बहरहाल, यह चार दशक पुरानी बात भर है. लेकिन मौजूदा दौर में लोगों को एक बार फिर लग रहा है कि वे इमरजेंसी के दौर में जी रहे हैं. लगना भी चाहिए, क्योंकि देश के लोकतंत्र को लोकतांत्रिक तरीक़ों से नुक़सान पहुंचाया गया है. लोकतंत्र पूंजीतंत्र पर निर्भर बना दिया गया है. इसीलिए तो 84 वर्ष का वृद्ध सरकार विरोधी से पहले बाज़ार विरोधी होता है, फिर नक्सल समर्थक, और अंत में देशद्रोही हो जाता है. और उसकी वेदना, उसके साथ हुए अन्याय धार्मिक जमात के संख्या तले दब दम तोड़ देती है.

अघोषित इमरजेंसी का दौर है, जो घोषित से ज़्यादा डरावनी

यह अघोषित इमरजेंसी का दौर है, जो घोषित से ज़्यादा डरावनी है. क्योंकि यहां सरकारी नीतियों से असहमति ही बड़ा दुश्मन बना है और आवाज उठाने वाला पत्रकार-बुद्धिजीवी या तो जेल में होता है, या फिर उस नौकरी से हटा दिया जाता है. लेकिन वहीं सत्ता के सरपरस्त में पनपे आइटी सेल, ट्रोल बटालियन जो नाम देना चाहें दे दें. झूठ से लेकर सांप्रदायिकता से लेकर, दुष्प्रचार से लेकर गाली तक परोसती है. धमकी तक देती है, उनका बाल तक बांका नहीं होता. लोकतंत्र के तमाम पाए इतने कमज़ोर हो चुके हैं कि वह इसके खिलाफ तो छोडिये अपने लिए खड़ा नहीं हो पाते. मसलन, देश लोकतांत्रिक ढंग से अलोकतांत्रिक बन चुका है.

ऐसे में यदि केन्द्रीय सरकार घिरती है तो वह जनता को जवाब देने के नाम बड़ा इवेंट कर भरमाती है. ज्ञात हो, देश में तमाम फैसले दो शख्स द्वारा लिया जाता है. लेकिन, विफलताओं के मद्देनज़र  उठे आवाज़ों को भरमाने के लिए मंत्रिमंडल का विस्तार जैसे इवेंट रचती है. और उन मंत्रियों को हटा दिया जाता है जिनका नाम तक जनता को याद नहीं रहा है. और उन मंत्रियों को जस का तस रखा जाता है जिसके कार्यकाल में देश त्रासदी की ओर बढ़ चुका है. मसलन, देश किससे उम्मीद करें कि भारतीय गणतंत्र अपने होने की गरिमा का मान रखेगा. यह एक मासूम सवाल है जिसके जवाब मायूस करने वाले हो सकते हैं.

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