टाइटैनिक जब बर्फीली पहाड़ी (आइसबर्ग) से टकराया, तो वह तुरंत नहीं डूबा – समय लगा

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कप्तान

टाइटैनिक जब बर्फीली पहाड़ी (आइसबर्ग) से टकराया, तो वह तुरत नहीं डूबा… समय लगा था

जहाज़ के कप्तान को टाइटैनिक के उस टक्कर की गंभीरता का एहसास हो चुका था। लेकिन, फर्स्ट क्लास सुइट में बैठे धनाढ्य सवारियों को इसका एहसास तो था लेकिन इतनी बड़ी क्षति का आभास नहीं हुआ था। टाइटैनिक जब डूबने लगा, तो सबसे पहले थर्ड क्लास कम्पार्टमेंट चपेट में आया। उसमें आम मध्यमवर्गीय शहरी थे। इंजन को चलाने के लिए भट्ठी में कोयला झोंकने वाले मज़दूर वर्ग थे।

उधर, फ़र्स्ट क्लास में सफ़र करने वाले इस विपदा से अनजान अपनी अलग ही खुमारी में मस्त थे। लेकिन वास्तव में टक्कर इतनी भयानक थी कि 20 करोड़ डॉलर लागत वाली टाइटैनिक पूरा ही डूब गया। हजारों लोग उस बर्फीली रात में मारे गए। जो बचे, उनमें अधिकांश धनवान थे! टाइटैनिक में सवार लोगों की मौत भी दर्दनाक व भयावह थी। एक आलीशान जहाज़ में जिंदगी के मजे लेते लोग ठंडे पानी में खड़े खड़े जम जम गए थे!

मार्के की बात, उस 20 करोड़ डॉलर के आकास्मात टाइटैनिक दुर्घटना की ज़िम्मेदारी तो उसके कप्तान ने ली थी, लेकिन 15 ट्रिलियन वाली टाइटैनिक को जानबूझ कर डूबोने वाला यह कप्तान ज़िम्मेदारी लेने से कतरा रहा है। Act of God कहवा पल्ला झाड़ रहा है। 

कप्तान
डूबता टाइटैनिक

दौड़ रही अर्थव्यवस्था को नोटबंदी व GST जैसे  दो आइसबर्गों से भिड़ा दिया

इस कप्तान ने अच्छी खासी दौड़ रही अर्थव्यवस्था (टाइटैनिक) को नोटबंदी व GST जैसे  दो पहाड़ियों (आइसबर्गों) से भिड़ा दिया। इस कप्तान को भी इसका आभास नोटबंदी में शहीद हुए नागरिकों ने करवा दिया था। इस टक्कर का भी यहाँ के संपन्न लोगों को आभास नहीं हुआ। हमारी विशाल अर्थव्यवस्था होने के कारण एक साल तक कुछ ख़ास असर नहीं हुआ। केवल निचले कम्पार्टमेंट के लोग ही इसके जद आये।

चूँकि कप्तान द्वारा लिए जा रहे फैसले संपन्न लोगों के पक्ष में दीखते थे …तो वे लगे शेखी बघारने! और अर्थशास्त्रियों को भला बुरा कहने लगे! 15 ट्रिलियन वाला टाइटैनिक अभी नोटबंदी और GST के झटके से उबरा भी नहीं सका था कि कोरोना जैसे पहाड़ ने दस्तक दी। लोकतंत्र के प्रहरियों  ने चेताया भी, लेकिन साहब तो हुनर हाट में लिट्टी चोखा चांपने में व्यस्त थे! …अंततः जहाज़ टकरा ही गया!

साहब के पुशार्थ देखिये – लोगों को घर में बैठाकर उलूल-जुलूल हरकतें करवाने लगे! कभी ताली बजवाई, तो कभी घण्टा! दीये मशाल सब जलवाए! लेकिन इससे लड़ने के लिए ठोस कदम नहीं उठाये! राज्य सरकारें गला फाड़ते रहे…

इस कप्तान ने दौड़ रही अर्थव्यवस्था को कितना डूबोया है 

  • देश भर में आधे करोड़ से ज्यादा लोग संक्रमित हैं 
  • अब तक 66 हजार लोग मारे गए!
  • करोड़ों लोगों की नौकरियां चली जाने से बेरोजगार हो चुके हैं 
  • लाखों लोग शहरों को छोड़कर वापस पैदल गांव चले आये हैं 
  • GDP 150 सालों के न्यूनतम स्तर को छू रही है

…और ताली-थाली, मोमबत्ती-दीया जलवाने वाला कप्तान इसे Act of God बता मुंह चुरा रहा है। और देश की संसाधनों को बेचने की बात कर रहा है सत्प्रर के श्न काल से भाग रहा है।।विद्रोही त्यागी।।

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