पत्थलगढ़ी के दर्ज मामलों को वापस लेकर मुख्यमंत्री ने राज्य को बिखरने से बचाया

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पत्थलगढ़ी आन्दोलन

अलग झारखंड से लेकर भाजपा के रघुवर काल तक के सरकारों द्वारा झारखंड के आदिवासियों-मूलवासियों की हुई उपेक्षा के कारण, सरकार के प्रति पनपे अविश्वास का नतीजा था पत्थलगढ़ी आन्दोलन। क्षेत्र में पनपे अविश्वास के कई साक्ष्य मौजूद है जिससे साबित होता है कि पूर्व की सरकारों ने इन क्षेत्रों में व्याप्त अज्ञानता का फायदा उठाया।

पांचवीं अनुसूची में आने वाले क्षेत्रों को उनके अधिकारों से वंचित किया गया 

पूर्व की सरकार खास कर भाजपा के सरकारों द्वारा झारखंड के पाँचवीं अनुसूची में आने वाले क्षेत्रों को उनके अधिकारों से वंचित किया गया था।

  • पाँचवीं अनुसूची में आने वाले क्षेत्रों में ट्राईबल एडवाइजरी काउंसिल का गठन अनिवार्य होता है। गवर्नर को इनके साथ लगातार बैठकें कर सालाना राष्ट्रपति को रिपोर्ट भी प्रस्तुत करना होता है। कुल मिला कर देखा गया कि रघुवर काल में जानबूझकर पूरी प्रक्रिया को नजर अंदाज किया गया था।
  •  अनुसूचित क्षेत्रों के कायदे-कानून अलग होने की वजह से पंचायती राज अधिनियम 1993 में बदलाव कर 1996 में पेसा (PESA), अधिनियम लागू किया गया था। जिसके भावना को रघुवर काल में खुले तौर पर नजरअंदाज किया गया।  
  • पुर की बीजेपी सरकार अपने चहेते पूँजीपतियों को सस्ती ज़मीन मुहैया कराने की मंशा से राज्य में लैंड-बैंक बनाना चाहती थी। इस प्रक्रिया के तहत सरकार खुद ही ज़मीन अधिग्रहित कर अपने पास रखना चाहती थी जिससे बाहरी कंपनियों या पूँजीपतियों को बिना रोक-रुकावट ओने-पौने दामों में ज़मीन मुहैया करा सके। इस योजना को धरातल पर उतारने के लिए रघुवर सरकार ने तानाशाही तरीके से छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम व संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम (CNT/SPT-act) में बदलाव करने का प्रयास किया। 

रघुवर काल तक पत्थलगढ़ी आन्दोलन का क्षेत्र विकास से कोसो दूर थी 

इससे सरकारी आंकड़े भी इनकार नहीं कर सकती कि पत्थलगढ़ी आन्दोलन के क्षेत्रों में रघुवर काल तक विकास की कोई लौ नहीं पहुंची थी? इस क्षेत्र के लिए आने वाला विकास का फंड का अधिकांश भाग बीच में ही ग़ायब हो जाते थे। अशिक्षा का अंधकार व्याप्त था और रघुवर सरकार लगातार स्कूल बंद कर रही थी। न साफ़ पानी न बिजली की सुदृढ़ व्यवस्था ही थी। न इन क्षेत्रों में रोज़गार की व्यवस्था थी और न ही पर्यटन जैसे व्यापार का माहौल। कुल मिला कर कहा जा सकता है कि सरकार की अनदेखी ने इन क्षेत्रों के लोगों में आसंतोश का बीज बो दिया था जो लगातार बिगड़ रहा था।

बात कर मामला सुलझाने के बजाय रघुवर सरकार ने अपनाया था तानाशाही रवैया 

दिलचस्प बिन्दु तब की भाजपा सरकार की यह रही कि उसने मामले की सत्यता को जानते हुए भी,  आंदोलनकारियों से बात कर मामला सुलझाने के बजाय निरंकुशता से आंदोलन कुचलने के क्रम में आंदोलनकारियों पर मामला दर्ज कर उन्हें जेल भेजा गया। जिससे न केवल गरीब झारखंडियों के परिवारों पर जीविका की संकट हुई बल्कि जनता का सरकार से विश्वास उठने की नौबत और गहरा गया। झारखंडी जनता और सरकार के बीच की विश्वास-डोर टूटने की कगार पर आ खड़ा हुआ था। जो राज्य में गृह युद्ध का कारण बन सकता था। 

झारखंड मानसिकता वाले हेमंत सोरेन पूरे मामले की गंभीरता को समझ रहे थे। मसलन, 29 दिसंबर 2019, मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ‌ ‌ग्रहण करते ही, उन्होंने शहीदों को नमन करने के बाद, सबसे पहले पत्थलगढ़ी के आंदोलनकारियों पर दर्ज मामलों को वापस लेने का फैसला लिया। जिससे न केवल जनता और सरकार के बीच की विश्वास-डोर फिर से स्थापित हुआ, आसंतोष से पनपने वाली दूरी को पाटने में भी सफलता हासिल की। और अपनी कुशल नेतृत्व का परिचय देते महान देश के लोकतंत्र के  मान बढ़ाए। इसी के साथ पहले ही दिन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने नयी झारखंड की दिशा व अपनी शासन प्रणाली का रूप-रेखा स्पष्ट की।

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