निशिकांत दुबे ने बीआरओ मुद्दे पर बयान दे अपनी मानसिकता का परिचय दिया है

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निशिकांत दुबे

एक ऐसे समय में जब पूरा देश महामारी की चपेट में है। मोदी सरकार श्रम क़ानूनों पर हमला करके श्रमिकों के शेष अधिकारों को समाप्त करने के लिए लगातार तैयारी कर रही है। और पूँजीपतियों के लाभ के लिए, वह श्रमिकों का शोषण करने का कोई अवसर नहीं छोड़ नहीं दिखती है।

झारखंड के सभी प्रवासी कामगार अभी अपने राज्य हीं पहुंच भी नहीं सके है। झारखंड सरकार उन्हें वापस लाने के लिए लगातार संघर्ष कर रही है। ऐसे में बीजेपी के गोड्डा सांसद निशिकांत दुबे का बीआरओ के प्रोजेक्ट के लिए श्रमिकों को लद्दाख नहीं जाने देने के बारे में जो बयान आया है। वह कामगारों के प्रति भाजपा का प्रेम समझने के लिए पर्याप्त हो सकता है।

दरअसल, सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) को एक परियोजना के लिए दुमका से 11,000 निर्माण श्रमिकों की आवश्यकता थी। जिन्हें वह 29 मई को लद्दाख ले जाना चाहती थी, लेकिन झारखंड सरकार ने इसकी अनुमति नहीं दी। तो भाजपा के गोड्डा सांसद निशिकांत दुबे ने इस मुद्दे पर न केवल झामुमो के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार की आलोचना की। राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा भी बता दिया।

निशिकांत दुबे जी का दलील

निशिकांत दुबे का दलील – “केंद्रीय गृह मंत्रालय ने श्रमिकों के लिए जसीडीह और दुमका रेलवे स्टेशनों से विशेष ट्रेनों की व्यवस्था की थी। लेकिन, राज्य सरकार ने विभिन्न उपसर्गों के तहत मज़दूरों को यात्रा करने की अनुमति नहीं दी। यह विकास के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। जह्र्खंड सरकार के इस फैसले के लिए केंद्र सरकार को कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए, क्योंकि, यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हो सकता है।”

हालांकि, इस विषय पर दुमका के डिप्टी कमिश्नर ने सूचित किया है कि अनुमति को वापस ले लिया गया है। क्योंकि झारखंड सरकार ने बीआरओ द्वारा श्रमिकों को मुहैया कराने वाली कार्य स्थितियों और मजदूरी पर चिंता जताई है। और श्रमिकों को यात्रा की अनुमति नहीं देने का मुख्य कारण  कोविद -19 है।

बीआरओ का मानसून के पहले निर्माण परियोजनाओं को गति देने की कोशिश

बीआरओ मानसून के आने से पहले अपनी निर्माण परियोजनाओं को गति देने की कोशिश कर रहा है। जिला प्रशासन ने मज़दूरों को ले जाने के लिए 20 मई और 23 मई को दो अलग-अलग पत्रों में अनुमति दी थी। लेकिन, जब मज़दूरों ने तालाबंदी में खराब स्थिति का हवाला देते हुए झारखंड सरकार से मदद की गुहार लगाई। तब झारखंड सरकार ने विमान से लद्दाख के बटालियन सेक्टर से 60 फंसे मज़दूरों को वापस बुला लिया। ये मज़दूर बीआरओ की सड़क निर्माण परियोजनाओं में लगे थे।

बहरहाल,  मोदी सरकार ने तालाबंदी से संबंधित नई अधिसूचना में कर्मचारियों को पूरा वेतन देने की शर्त को हटा दिया है। और उद्योगों के वकील सरकार के इस कदम को भी पर्याप्त नहीं बता रहे हैं। जिसका अर्थ यही हो सकता है कि उद्योगपति अपने कर्मचारियों को वेतन देने के पक्ष में नहीं है। उस सरकार श्रमिकों के दर्द से कोई वास्ता वास्तव में नहीं हो सकता। ऐसे में अगर झारखंड राज्य के मुख्यमंत्री ने अपने लोगों के प्रति गंभीरता दिखाते हुए कोई ठोस कदम उठाया है, तो यह स्वागत योग्य हो सकता है।

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