जनजाति

नई शिक्षा नीति से 8वीं अनुसूची में शामिल संथाली, बोडो जैसी जनजाति भाषा को मिलेगा फायदा, मुंडारी, हो व उरांव का पिछड़ना तय

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जनजाति समाज को बीजेपी ने वोट बैंक की तरह किया इस्तेमाल, नहीं चाहते कि झारखंडी जनजाति भाषा का हो विकास

रांची  : मोदी सरकार की एक और योजना विवादों  में है। योजना है “नई शिक्षा नीति” और इसपर सवाल उठाने वाले हैं, झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन। दरअसल मुख्यमंत्री श्री सोरेन ने यह सवाल राज्य के अधिकांश जनजाति भाषा के पिछड़ने को देखते हुए उठाया है। क्योंकि मोदी सरकार की इस विवादित नीति नई शिक्षा नीति में केवल 8वीं अनुसूची में शामिल क्षेत्रीय भाषाओं का ही जिक्र किया गया है।

वर्तमान में 8वीं अनुसूची में झारखंड से केवल “संथाली” जनजाति भाषा और असोम में बोली जाने वाली “बोडो” भाषा ही शामिल है। जाहिर है मोदी सरकार की इस नीति के कारण देश और राज्य  के अन्य जनजाति भाषाओं का पिछड़ना तय है। जिसमे झारखंड में बहुसंख्यक जनजाति में बोली जाने वाली हो, मुडांरी, उरांव (कुडूख) जैसी भाषा शामिल है। लेकिन सत्ता के घमंड में चूर मोदी सरकार नहीं चाहती है कि झारखंड और देश के अन्य राज्यों में बोले जाने वाली जनजाति भाषा का विकास हो। 

नीति बनाने वाले यह भूल गये कि बहुत ऐसी जनजाति भाषाएं 8वीं अनुसूची का अभी तक हिस्सा नहीं बनी है

सोमवार को राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के साथ हुई बातचीत में मुख्यमंत्री ने साफ कर दिया है कि नई शिक्षा नीति से जनजाति भाषाओं को नुकसान होगा। हेमंत ने कहा है कि इस नयी नीति में क्षेत्रीय भाषाओं को शिक्षा के माध्यम के रूप में बढ़ावा देने की बात कही गयी है। लेकिन, अफसोस कि इस नीति में केवल 8वीं अनुसूची में सम्मिलित भाषाओं का ही जिक्र है। 

हेमंत के मुताबिक 8वीं अनुसूची को आधार बनाकर नीति बनाने वाले यह भूल गये है कि अभी भी बहुत सी ऐसी जनजाति भाषाएं हैं जो 8वीं अनुसूची का हिस्सा नहीं बन पायी है। जाहिर है कि इस नयी नीति से उनके साथ अन्याय होगा। मुख्यमंत्री ने कड़े शब्दों में कहा है कि झारखंड में हो, मुंडारी,  उरांव (कुडुख) जैसी कुछ जनजाति भाषाएं है, जिन्हें 8वीं अनुसूची में जगह नहीं मिल पाई है। लेकिन, भाषो को बोलने वाले की संख्या 10-20 लाख तक है।   

केंद्र और राज्य दोनों में बीजेपी सत्ता थी, फिर अन्य जनजाति भाषा क्यों नहीं 8वीं अनुसूची में जोड़े गये

विशेष जाति से संबंध रखने वाली बीजेपी राज्य की जनजाति को केवल वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया है। बीजेपी के नेताओं ने कभी नहीं चाहा है कि जनजातियों का उत्थान हो। वहीं दूसरी तरफ, जनजाति समाज से संबंध रखने वाले मुख्यमंत्री को इनके पिछड़ेपन के दर्द का अहसास है। जनजाति भाषा के हित में सीएम श्री सोरेन के उठाये सवाल से बीजेपी ने खुद को बैकफुट पर पाया।

पोल खुलते देख प्रदेश बीजेपी के प्रवक्ता यह कहने से नहीं चुके कि बीजेपी ने ही संथाली भाषा को संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल किया। और रघुवर सरकार ने कुडुख, मुडांरी, हो को 8वीं अनुसूची में शामिल करने की पहल की। लेकिन, इस बयान से यह सवाल तो उठेगा ही कि जब केंद्र औऱ राज्य में उनकी ही सरकार थी, तो आखिर क्यों नहीं अन्य भाषों को 8वीं अनुसूची में जोड़ने की पहल हुई। 

दरअसल, बीजेपी जनजाति के बीच वोट बैंक वाली राजनीतिक से इतर अलग छवि बनाकर रखना चाहती है। लेकिन, वे भूल जाती है कि अभी झारखंड की सत्ता पर जनजाति समाज का ही बेटा बैठा है। जो बीजेपी के मंसुनों को नाकाम के लिए हर संभव लड़ाई लड़ने को तैयार है।

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