नयी नियमावली पर भाजपा का घड़ियाली आंसू क्यों ?

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नयी नियमावली

नयी नियमावली पर भाजपा जहाँ वह झारखंड के युवाओं को भ्रमित करने का प्रयास कर रहे हैं. वहीं इसके आड़ में वह बाहरी-भीतरी की राजनीति भी कर रहे है.

रांची : झारखण्ड के राजनीतिक परिदृश्य में लगातार हाशिए पर जा रही भाजपा ऐसे मौके की तलाश में रहती है. जहां वह राज्य की युवाओं को बरगला कर हेमन्त सरकार को घेर सके. हालांकि, उसे हमेशा मुंह की खानी पड़ी है. फिर भी मौजूदा दौर में प्रदेश भाजपा राज्य में नियुक्तियों के के मद्देनजर, होने वाली परीक्षा संचालन नयी नियमावली को लेकर घमासान पर उतारू हैं. भाजपा ने इसे तुष्टीकरण की नीति बताया है. 

भाजपा की दलील है कि इस नीति में राजभाषा हिंदी का अपमान हुआ है. भाजपा की सहयोगी पार्टी आजसू का इस मुद्दे पर कहना है कि नियुक्ति नियमावली झारखंड की मूलभावना के विपरीत है. जबकि नई नियमवली स्थानीय और आदिवासी हित में तैयार किया गया है. दोनों ही पार्टियों व उनसे जुड़े संगठन मसले पर लगातार शोर मचा रहे हैं. ऐसा कर जहाँ वह झारखंड के युवाओं को भ्रमित करने का प्रयास कर रहे हैं. वहीं इसके आड़ में वह बाहरी-भीतरी की राजनीति भी कर रहे है. बाहरियों की बैसाखी पर खड़ी भाजपा को उसकी राजनीतिक ज़मीन खिसकने का डर सता रहा है.  

नयी नियमावली मामले में भाजपा का घड़ियाली आंसू बहाना राजनीतिक 

आजसू नेताओं की स्मृति लोप के मद्देनजर, प्रदेश भाजपा को स्मरण करना चाहिए कि नियुक्ति नियमावली में जिन जनजातीय व क्षेत्रीय भाषाओं का जिक्र किया गया है, ये भाषाएं पूर्ववर्ती भाजपा सरकार में भी थी. लाजिमी है कि उनके शासनकाल में भोजपुरी, मगही, अंगिका को राज्यस्तरीय परीक्षा में नहीं जोड़ा गया. तो ऐसे में उनका इन भाषाओँ को लेकर राजनीति करना केवल एक आडम्बर भर है. पांच साल तक चली डबल इंजन की भाजपा की पूर्व सरकार का मामले में घड़ियाली आंसू बहाना साफ़ राजनीतिक है. उस सरकार में केवल झारखंडी भावनाओं के साथ खिलवाड़ हुआ, यहीं आखिरी सच है. 

हिंदी को लेकर भाजपा नेताओं का बयान बेतुका

राष्ट्रीय भाषा हिंदी को लेकर भी भाजपा नेताओं के ताजा बयान बेतुका है. जहां तक आजसू की बात है, सर्वविदित है कि आजसू ने झारखंड के नाम पर भावनात्मक खेल से हमेशा ही झारखंडियों को छला है. उसके लिए किसी भी तरह सत्ता हासिल करना पहली प्राथमिकता रही है. मसलन, जब मुख्यमन्त्री हेमन्त सोरेन के नेतृत्व में सरकार का गठन हुआ तो पहली  बार जन मानस को लगा कि हर स्तर पर झारखंडी भाषा, संस्कृति, रीति-रिवाजों, यहां की जनभावना और झारखंडी युवाओं के हितों की रक्षा हो रही है. 

ज्ञात हो, पूर्व की सिर्फ बयानबाजियां ही होती रही कि शिक्षा व नौकरियों में झारखंडियों के हितों को प्राथमिकता दी जायेगी. लेकिन मुख्यमन्त्री हेमन्त सोरेन की सरकार ने जता दिया है कि राजनीति से परे उनके लिए झारखंड की जनभावना सर्वोपरि है. उसी भावना के मद्देनजर जनजातीय व क्षेत्रीय भाषाओं को प्राथमिकता में रखा गया है. राज्य की बहुसंख्य जनता की तरफ से जो रूझान आ रहे हैं उससे पता चलता है कि वे सरकार के निर्णय के साथ खड़े है. विरोध में कुछ आवाजें जरूर है पर वे विपक्षी पार्टियों की शह पर होनेवाले शोर भर है.

बहुत सारे लोग तथ्यों और जानकारियों के बिना शोर मचा रहे हैं. उन्हें एक बार नियुक्ति परीक्षाओं की संचालन नियमावली को भी जरूर पढ़ना चाहिए. उसमें लिखा है कि जिला स्तरीय अधिसूचित भाषाओं को सरकार के द्वारा अलग से अधिसूचित किया जायेगा. इससे पता चलता है कि सरकार का नयी नियमावली को लेकर लिया गया फैसला राज्य की व्यापक जनता के हित से जुड़ा है.

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