नगर निकाय और पंचायत चुनाव में दलीय व्यवस्था खत्म करने से भाजपा को परेशानी क्यों?

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नगर निकाय और पंचायत चुनाव

हेमन्त सरकार में चुनाव के मद्देनजर नयी परम्परा की शुरुआत है. जहाँ प्रतिस्पर्धा दिखेगी और हर वर्ग को नगर निकाय और पंचायत चुनाव लड़ने का मौका मिलेगा

झारखण्ड में राज्य सरकार द्वारा आगामी नगर निकाय, नगर परिषद एवं नगर पंचायत चुनाव को लेकर महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया है. इस निर्णय के तहत चुनाव को दलीय आधार पर न कराने का फैसला लिया गया है. इस निर्णय से भाजपा की परेशानी बढ़ गयी है. बाकायदा बाबूलाल मरांडी ने ट्वीट कर फैसले पर आपत्ति जतायी है. उन्होंने कहा है कि सरकार को फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए. बाबूलाल मरांडी की दलील है कि दलीय आधार पर चुनाव नहीं होने पर, प्रत्याशी पैसे और बाहुबल से चुनाव को प्रभावित कर सकते हैं. बाबूलाल मरांडी का मानना है कि बाहुबली और पैसे वाले लोग चुनाव को प्रभावित कर सकते हैं। 

बाबूलाल मरांडी की परेशानी के दो प्रमुख कारण

मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में बाबूलाल मरांडी की परेशानी के दो प्रमुख कारण हो सकते हैं. पहली वजह – बाबूलाल जिस पार्टी का प्रतिनिधित्व करते है, देश भर में चुनावों को प्रभावित करने की क्षमता उस पार्टी के अलावा अन्य किसी पार्टी नहीं है. भाजपा शासन में देश इस सत्य से परिचित हो चला है. भाजपा चुनावों में धन, बल व हर उस प्रपंच का सहारा लेती है जिससे वह चुनाव जीत सकें. यह दल सरकार बनाने बिगाड़ने, चुनावों में जन भावनाओं को कुचलने जैसी नयी प्रथा का सूत्रधार है. ऐसे में बाबूलाल मरांडी ऐसा बयान आना हास्यास्पद हैं और खीज भी हो सकती है. 

दूसरी वजह : झारखंड में भाजपा को शहरी पार्टी के रूप में भी जाना जाता है. क्योंकि इस दल को मुख्यता सेठ-साहूकार व मनुवादी विचारधारा के लोग सींचते है. यहाँ दलित-दमितों का स्थान नगण्य है. नतीजतन, दलीय आधार पर चुनाव होने से भाजपा प्रत्याशी की जीत आसानी से होने की सम्भावना बढ़ जाती है. मसलन, हेमन्त सरकार में चुनाव के मद्देनजर नयी परम्परा की शुरुआत हुई है. जहाँ चुनावों में प्रतिस्पर्धा दिखेगी. और हर वर्ग के लोगों को चुनाव लड़ने का मौका मिलेगा. 

ज्ञात हो, झारखंड में नगर निकाय व पंचायत चुनाव को दलीय आधार पर कराने का फैसला पूर्व की भाजपा सरकार ने ही लिया था. जिसका फायदा उसे पूर्व में मिला भी था. और आज हम नगर निगम की स्थिति देख पा रहे हैं. भाजपा द्वारा गिरिडीह नगर निगम में तो बाहरी प्रत्याशी को आरक्षित पद से चुनाव लडवा दिया गया. लेकिन, हेमन्त सरकार के नये फैसले ने भाजपा के राजनीतिक समीकरण को बिगाड़ दिया है. जिससे शहरों में भाजपा का तिलिस्म टूटने के कगार आ खड़ा हुआ है. यहीं बाबूलाल जी के तिलमिलाहट की और चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाने की वजह हो सकती है. 

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