मुर्गों

मुर्गों यह जान लो फैसला तो हो चुका है

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अलग झारखंड काल से दस साल पहले देश ने निजीकरण, उदारीकरण और वैश्वीकरण को स्वीकार किया। चलिए, निजीकरण को एक छोटी सी कहानी के जरिए समझते हैं। कुछ साल पहले की बात है। मुर्गों की एक बड़ी मीटिंग बुलाई गयी। देश भर से मुर्गे-मुर्गियां, उसके चुजे, बड़े मुर्गे  इस मीटिंग में शामिल हुए। मीटिंग में लोकतंत्र, समता, स्वतंत्रता, स्वराज, आज़ादी की चर्चा हुई। सबने आज़ादी, और स्वराज की बात की। काफी तालियां बजी। ज़ोरदार नारे लगे। 

मंच की सजावट उसकी भव्यता का परिचय दे रहा था। आयोजक मंत्री ने मुर्गों से कहा कि देश में अब आज़ादी है, आप अपना निर्णय खुद ले सकते हैं। आप जितने मुर्गे, मुर्गियां हैं, अब खुद निर्णय ले सकते हैं कि, अपलोग किस तरह के तेल में, या किस कंपनी के तेल में तले जाएँ। मुर्गों की भीड़ ने जोर से नारा लगाया। लोकतंत्र ज़िंदाबाद, समाजवाद ज़िंदाबाद। 

सभी खुश थे क्योंकि कि वे अब खुद निर्णय ले सकते थे। लेकिन उन आज़ादी के मतवालों को कहाँ पता था, कि तलने से पहले उनका कत्ल किया जाएगा। इसी बीच दो चार बुजुर्ग मुर्गे आपस में चर्चा करने लगे, कि तलेगा कब, कैसे, कत्ल होगा तभी तो? दोनों बुजुर्ग मुर्गों ने आयोजक मंत्री से यह जानने की इच्छा जताई। 

मुर्गों की बलि दी जाएगी, तभी तो तलने की बारी आएगी

आयोजक ने उन्हें मंच पर बुलाया और दोनों मुर्गों से उनके सवाल पूछा। मुर्गों ने अपनी सवाल दोहराए – पहले तो इन मुर्गों की बलि दी जाएगी, तभी तो तलने की बारी आएगी। आयोजक ने कहा, हाँ। फिर बुजुर्ग मुर्गे ने ताक़त बटोर कर कहा, क्यों न कुछ ऐसा हो जिससे मुर्गे की कत्ल ही न हो। तब आयोजक ने कहा, इनका क़त्ल होंना तय है। क्योंकि यह फैसला हो चुका है।

मसलन, निजीकरण का यही कडवी सच्यचाई है। और यही हाल रहा तो, एक दिन सब बिक जाएगा, रेल, स्कूल, स्टेशन, एयरपोर्ट। सब निजी हो जायेंगे। कुछ भी सरकारी नहीं होगा मतलब देश के लोगों का नहीं होगा। प्रकृति से जो चीजे हमें फ्री मिली है, निजीकरण के दौर में उसे भी हमें खरीदना पड़ता है। पानी ख़रीद कर पीते ही तो हैं। वह दिन दूर नहीं, जब सांस लेने का भी कीमत चुकाना होगा। जिंदगी जीने का भी टैक्स देना होगा। 


अब सवाल उठता है, तब सरकार क्या करेगी? सरकार पूरे सिस्टम का मैनेजर रहेगी। आज भी हम वोट देकर देश को चलाने के लिए मैनेजर ही तो बहाल करते हैं। …Ramdeo Vishwabandhu

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