मोदी-योगी काल में महिला अपराध मामलों में पहले की तुलना में 25 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी 

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महिला अपराध मामलों में पहले की तुलना में 25 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी 

मोदी-योगी काल में महिला अपराध मामलों में 25 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी. देशभर में पूर्ण या आंशिक लॉकडाउन रहने के बावजूद 2020 में प्रति-दिन औसतन 77 बलात्कार के मामले दर्ज हुए हैं. 

मोदी काल में लॉकडाउन के कारण चोरी, लूटपाट जैसे कई अपराधों में कुछ कमी आयी, लेकिन इस मनुवादी सत्ता में महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले विभिन्न अपराधों में बढोतरी हुई है. जुलाई 2021 में राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, कोरोना महामारी के दौरान महिला आयोग में आयी शिकायतों में पहले की तुलना में 25 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है. पिछले साल देशभर में पूर्ण या आंशिक लॉकडाउन रहने के बावजूद 2020 में प्रति-दिन औसतन 77 बलात्कार के मामले दर्ज हुए हैं. 

दिल्ली, उत्तरप्रदेश, पुणे, हैदराबाद, गुंटूर सहित देश के विभिन्न हिस्‍सों से औरतों और बच्चियों के साथ बर्बर बलात्कार और हत्याओं की ख़बरें आयीं. जो मनुवादी सत्ता में भारतीय समाज में बढ़ती हुई सड़ाँध की निशानी हो सकती है. ये बढ़ती दरिन्‍दगी दिखाती है कि घोर स्‍त्री-विरोधी आपराधिक सोच अब समाज के रेशे-रेशे में पैठ बना चुकी है. और नैतिकता के पाठ की स्थिति यह है कि भाजपा का पार्टी कार्यालय अपराधियों को संरक्षण देने के प्रयोग में लाया जा रहा है.

मनुवादी नेताओं-मंत्रियों की महिला सुरक्षा के वायदों की उड़ी धज्जियाँ

देशभर में बढ़ते महिला अपराध, मनुवादी नेताओं-मंत्रियों द्वारा औरतों के लिए सुरक्षित माहौल बनाने के वायदों की धज्जियाँ उड़ाते दिखते हैं. अपराधियों व अपराध को छुपाने के मामले में, नाकामी छिपाने में अब भाजपा शासित राज्य के रहनुमा पुलिस-प्रशासन के खुला अवैधानिक प्रयोग से भी गुरेज नहीं कर रहे. और यदि आरोपी नेता-मंत्री का चिराग नहीं है, कोई आम नागरिक है तो बलात्कार के आरोपी को पुलिस एनकाउण्‍टर में मार दिया जाता है. 

दो साल पहले हैदराबाद में दिशा नाम की एक पशु-चिकित्सक के बलात्कार और हत्या के मामले में आरोपियों को फ़र्ज़ी एनकाउण्‍टर में तो मार दिया गया. लेकिन यह कर्तव्यनिष्ठा उत्तर प्रदेश में नहीं दिखी. जहाँ दलित बेटी को तो योगी सरकार जला देती है पर अपराधी का कुछ भीं होता हैं. ऐसे मामलों में पुलिस-प्रशासन आरोपी को बचाने के लिए और उसे निर्दोष साबित करने के लिए दिन-रात एक कर करते दिखते हैं, हाथरस, उन्‍नाव और कठुआ जैसे मामले इसके स्पष्ट उदाहरण हो सकते हैं.

क्यों बढ़ रहे हैं ऐसे बर्बर महिला अपराध?

भारतीय ब्राह्मणवादी समाज में औरतों को मर्दों का ग़ुलाम समझने की मानसिकता वैदिक-रामायण-महाभारत काल से चली आ रही है. इस समाज में नैसर्गिक गति से आधुनिकता आ पाती अंग्रेज़ों की ग़ुलामी का शिकार हो गया. अंग्रेज़ों ने औरतों की ग़ुलामी क़ायम रखने के लिए मुख्य रूप से ज़िम्मेदार राजे-रजवाड़ों और सामन्‍तों के साथ गठबन्‍धन कायम कर लिया. जिसका एक नतीजा यह भी हुआ कि औरतों की ग़ुलामी बरक़रार रही. 1947 में अंग्रेज़ों के जाने के बाद यहाँ की सत्ता पर मनुवादी  क़ाबिज़ हो गए. उसने नीतियों के ज़रिए सामन्‍तों को पूरा मौक़ा दिया. इस प्रकिया में पुराने सड़े-गले स्‍त्री-विरोधी और जातिवादी संस्कार, मूल्य और मान्यताएँ समाज में यथावत कायम रहे.

नतीजतन, आज़ादी के बाद पूँजीवादी विकास के मद्देनजर औरतों को घर-गृहस्‍थी की घुटनभरी दुनियां से बाहर निकलकर काम करने के लिए बाहर जाने का मौक़ा तो मिला, लेकिन सड़कों से लेकर कारख़ानों तक क़दम-क़दम पर मनुवाद की पुरुष-प्रधान पितृसत्तात्‍मक समाज के सड़े-गले संस्‍कारों-मूल्‍यों-मान्‍यताओं से लैस मानसिकता से उनका पिण्‍ड नहीं छूट पाया. पुराने सामन्‍ती मूल्‍य-मान्‍यताओं और आधुनिक पूँजीवादी उपभोक्‍तावादी संस्‍कृति के मेल से पूरे समाज में औरत-विरोधी मानसिकता को फलने-फूलने का मौक़ा मिल गया और महिला अपराध को बढ़ावा मिला.

भारतीय राज्‍यसत्ता की विभिन्न संस्थाओं में गहराई तक पैठी स्‍त्री-विरोधी सोच मौजूदा केन्द्रीय मनुवादी सत्ता के कैनवास में नौकरशाही और पुलिस तंत्र में फलने-फूलने का भरपूर मौका दिया. जिसके अक्स में महिलाओं को इन्साफ़ मिलना मुश्किल हो गया तो वहीं आरोपियों व अपराधियों को बचना आसान हो गया. अब तो स्थिति यह हो चली कि भाजपा नेता-मंत्री और अधिकारी औरतों पर हो रहे ज़ुल्‍मों के लिए औरतों को ही ज़िम्मेदार बता रहे हैं. जिससे अपराधियों-बलात्‍कारियों की हिम्मत बढ़ चली है.

औरतों के ख़िलाफ़ बढ़ते अपराधों के सिलसिला को कैसे रोका जाये 

मसलन, औरतों के ख़िलाफ़ हो रहे ज़ुल्‍मों के लिए मुख्‍य रूप से समाज का ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्‍मक ढाँचा ज़िम्मेदार है, इसलिए औरतों को इन ज़ुल्‍मों से पूरी तरह से मुक्ति इस ढाँचे को तोड़कर बराबरी व न्याय पर आधारित समाजवादी लोकतांत्रिक समाज बनाने के बाद ही हासिल हो पायेगी. इसलिए महिलाओं की मुक्ति की लड़ाई सीधे तौर पर ब्राह्मणवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई से ही संभव है. हर स्तर पर जनान्‍दोलन खड़ा कर वर्तमान ढाँचे के भीतर शासन-प्रशासन को फिर से लोकतांत्रिक व संवैधानिक बनाए जाने पर दबाव डालना चाहिए और महिला अपराध मामलों में त्वरित न्याय की दिशा में भी दबाव बनाया जाना चाहिए.

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