मोदी सत्ता में श्रम क़ानून में पूँजी परस्त बदलाव – ट्रेड यूनियनों के पास कारगर जवाब तक नहीं

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मोदी सत्ता में श्रम क़ानून में पूँजी परस्त बदलाव

देश में मज़दूरों के लिए दर्जनों श्रम क़ानून काग़ज़ों पर मौजूद हैं. पर तमाम कारख़ानों-खेतों खलिहानों में काम करने वाले श्रमिक समझते हैं कि इन क़ानूनों की वास्तविकता क्या है. मोदी सत्ता में देश के असंगठित-अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत मज़दूर आबादी तो वैसे भी इन तमाम क़ानूनों के दायरे में बिरले ही आती है. औपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले संगठित कामगारों-कर्मचारियों को क़ानूनी संरक्षण के दायरे से बाहर करने की क़वायदें मोदी सत्ता में तेज़ हो चली है. 

मोदी सरकार में मज़दूरों को प्राप्त श्रम क़ानून रूपी राजकीय सुरक्षा और संरक्षण पर हमला बोला जा रहा है. फ़ासीवाद मज़दूर वर्ग के रहे-सहे अधिकार भी छीनने पर आमादा है. मज़दूर वर्ग-विरोधी मुहिम को लगातार आगे बढ़ा रही हैं. पूँजीपति वर्ग के “धन्धे और कारोबार में आसानी” के नाम पर श्रम के अनौपचारिकीकरण, ठेकाकरण, कैज़ुअलकरण आदि की प्रकिया को बड़े पैमाने पर संवेग प्रदान किया जा रहा है. और मौजूदा परिस्थिति में श्रम क़ानून स्वरूप किसी भी पैमाने से मज़दूरों के हक़ों-अधिकारों की नुमाइन्दगी नहीं करते.

केन्द्रीय सरकार पूँजीपति वर्ग के दीर्घकालिक हितों की कर रही है प्रतिनिधित्व

वास्तव में श्रम क़ानूनों के पूरे इतिहास और विकास क्रम को देखने पर पता चलता है कि केन्द्रीय सरकार पूँजीपति वर्ग के दीर्घकालिक सामूहिक वर्ग हितों का प्रतिनिधित्व कर रहा है. ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 का मूलभूत उद्देश्य “उत्तरदायित्वपूर्ण यूनियनवाद” को बढ़ावा देना था, वहीं औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 का मक़सद विवाद के पक्षों को समझौते के लिए बाध्य करना था. इन क़ानूनों के निर्माण में भी मुख्य तौर पर जुझारू मज़दूर संगठनों व संघर्षों की भूमिका अग्रणी थी. 

लेकिन मौजूदा दौर में केन्द्रीय ट्रेड यूनियन, सामाजिक जनवादी ट्रेड यूनियन मज़दूर वर्ग के लिए विश्वासघाती और हक़-हुक़ूक की सौदागर साबित हुई है. केन्द्रीय ट्रेड यूनियन, सामाजिक जनवादी ट्रेड यूनियन संगठित क्षेत्र के मज़दूर आन्दोलन का ख़ास क़िस्म का विराजनीतिकरण कर उसे जुझारू अर्थवाद और ट्रेड यूनियनवाद के अन्धकार में फंसा दिया है. और क़ानूनवाद के ज़रिए आन्दोलन की धार को भी कुन्द किया है. श्रम क़ानूनों में प्रदत्त प्रावधानों को ही संघर्ष का अन्तिम गंतव्य बना दिया है. और आज मोदी सरकार द्वारा जब श्रम क़ानूनों में खुले तौर पर पूँजी परस्त बदलाव हो रही है तो ये कारगर जवाब तक देने की स्थिति में नहीं आ पा रहे.

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