लक्षद्वीप की शांति को भी भंग करने में जुटे संघ-भाजपा

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लक्षद्वीप

लक्षद्वीप में जनविरोधी प्रस्तावों, मसौदों – “गुण्डा अधिनियम”, “तटरक्षक अधिनियम”, “पशु संरक्षण अधिनियम” तथा “मसौदा लक्षद्वीप विकास प्राधिकरण विनियमन, 2021 (एलडीएआर 2021)” का कड़ा विरोध हो रहा है

भाजपा के केन्द्र में सत्तासीन होने से आर.एस.एस. को अपना साम्प्रदायिक एजेण्डा लागू करना आसान हो गया और वह मौक़ा नहीं छोड़ रहा. मोदी सरकार ने इसी कड़ी में निशाना साधा है. ज्ञात हो, विकास और बदलाव के नाम पर लक्षद्वीप में तानाशाही का नया फ़रमान जारी हुआ है. फ़ासीवादी एजेण्डा के मद्देनजर लक्षद्वीप में संघी प्रशासक द्वारा वहां के पारम्परिक खान-पान, घर-बार, रोज़गार, राजनीतिक व जनवादी अधिकार में दखल दिया जा रहा है. पेश प्रस्ताव के तहत, विकास के नाम पर आम लोगों की ज़मीन हथियाने की योजना से लेकर स्थानीय चुनाव में उनकी भागीदारी सीमित करने तक योजना शामिल हैं. 

भाजपा सरकार के प्रस्ताव के मुताबिक दो से अधिक बच्चों के माता-पिता स्थानीय निकाय चुनाव में हिस्सेदारी नहीं ले सकते. इसलिए, लक्षद्वीप के  नागरिक व इंसाफ़पसन्द बुद्धिजीवी, देश के सबसे शान्त इलाके में मोदी सरकार के इस साम्प्रदायिक खेल का विरोध कर रहे हैं.

लक्षद्वीप की भौगोलिक, सामाजिक व राजनीतिक परिस्थितियां 

लक्षद्वीप कई द्वीपों का समूह है और अरब सागर में स्थित है. यहाँ के द्वीप भारत के तटीय शहर कोच्चि से क़रीब 220-440 किमी की दूरी पर हैं. यह 36 अलग-अलग द्वीपों का समूह है. इसका कुल क्षेत्रफल 32.62 वर्ग किलोमीटर है. 2011 की जनगणना के मुताबिक यहाँ की कुल आबादी 64,473 है. केरल से निकट होने से यहाँ की अधिकतम आबादी मलयालम भाषा बोलती है. आबादी का बड़ा हिस्सा नारियल की खेती व मछलीपालन पर निर्भर है.

लक्षद्वीप में मुस्लिम आबादी की बहुतायत है. जनगणना 2011 के मुताबिक, मुस्लिम आबादी कुल आबादी का 96.58% हिस्सा है. ऐसे में यह समझा जा सकता है कि भाजपा यहाँ के शान्तिपूर्ण माहौल को क्यों बिगाड़ना चाहती है. दूसरा बड़ा कारण – लक्षद्वीप की प्राकृतिक सुन्दरता को देशी-विदेश के अमीर सैलानियों को बेचने के लिए यहाँ फ़ाइव स्टार होटल, रिज़ॉर्ट आदि बनवाने के ठेके अपने चहेते पूँजीपतियों को दिये जायें, जिनमें से ज़्यादातर गुजराती हैं. ऐसा प्रतीत हो रहा है कि  लक्षद्वीप के नाज़ुक पर्यावरण के नुक्सान से भी भाजपा को गुरेज़ नहीं है.

लक्षद्वीप एक केन्द्र शासित प्रदेश है. भाजपा के पूर्व नेता तथा आरएसएस के क़रीबी प्रफुल्ल खोदा पटेल पिछले साल दिसम्बर में लक्षद्वीप प्रशासक बनाये गये थे. इसके बाद लगातार वहाँ आरएसएस अपने एजेण्डे के तहत काम कर रहा है. आम जनता तथा स्थानीय निर्वाचित प्रतिनिधियों से मशविरा किये बिना विधान बदल रहे हैं, क़ानूनों को संशोधित कर रहे हैं. लक्षद्वीप को फ़ासीवाद की नयी प्रयोगशाला बना दिया गया है. 

अमित शाह के जेल जाने के दौरान प्रफुल्ल ही मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के सिपहसालार रहे

प्रफुल्ल ही अमित शाह के जेल जाने के दौरान मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के सिपहसालार थे. ग़ौरतलब है कि प्रफुल्ल पटेल का विवादों के साथ चोली-दामन का साथ रहा है. फिलहाल उन पर महाराष्ट्र के स्वतंत्र सांसद मोहन डेलकर की आत्महत्या के सिलसिले में जाँच भी चल रही है. लक्षद्वीप में कोरोना के फ़ैलने के ज़िम्मेदार भी प्रशासक प्रफुल्ल पटेल ही थे. देशभर में कोरोना के संक्रमण फ़ैलने के बावजूद लक्षद्वीप बचा हुआ था, क्योंकि यहाँ आने वाले सभी यात्रियों की कोविड जाँच और एक हफ़्ते का क्वारण्टाइन अनिवार्य था. लेकिन प्रफुल्ल ने इस अनिवार्यता को ख़त्म कर यहाँ कोविड को खुला निमंत्रण दे दिया था. 

यहाँ संक्रमण का पहला मामला 18 जनवरी 2021 को सामने आया था. और आज कुल आबादी का दस फ़ीसदी संक्रमण की चपेट में है. संघी प्रशासक की लापरवाही के कारण लक्षद्वीप में मई 2021 में कोरोना जाँच में पॉज़िटिव आने की दर 68 प्रतिशत पहुँच गयी थी. 

सीएए-एनआरसी का लक्षद्वीप में भी विरोध 

सीएए-एनआरसी जैसे जनविरोधी क़ानून के विरोध के दौरान प्रदर्शन कर रहे लोगों पर कार्रवाई की गयी थी. लक्षद्वीप में प्रफुल्ल पटेल के प्रशासन द्वारा लाये गये जनविरोधी प्रस्तावों, मसौदों का कड़ा विरोध हो रहा है. लोगों के विरोध के केन्द्र में “गुण्डा अधिनियम”, “तटरक्षक अधिनियम”, “पशु संरक्षण अधिनियम” तथा “मसौदा लक्षद्वीप विकास प्राधिकरण विनियमन, 2021 (एलडीएआर 2021)” है. मसलन, भाजपा क़ानूनों के ज़रिए अपने फ़ासीवादी एजेण्डे को लागू करने का काम कर रही है.

गुण्डा अधिनियम 

प्रफुल्ल ने पदभार सँभालते ही सबसे पहले गुण्डा अधिनियम को लागू करने का काम किया. इस क़ानून के तहत प्रशासक किसी को भी शक की बिना पर पुलिस से पकड़वाकर रख सकता है. और उस व्यक्ति को किसी भी तरह की मदद से वंचित रखा जायेगा. इस नज़रबन्दी की अवधि 12 महीने या उससे अधिक भी हो सकती है. ग़ौरतलब है कि पूरे भारत में लक्षद्वीप सबसे कम आपराधिक मामले वाले प्रदेशों में आता है. 31 दिसम्बर 2019 की आधिकारिक जानकारी के मुताबिक लक्षद्वीप की जेलों में केवल 4 लोग ही क़ैद हैं. आम लोगों का कहना है कि ऐसे प्रदेश में यह क़ानून गैर-जनवादी है.

मसौदा लक्षद्वीप विकास प्राधिकरण विनियमन, 2021 (एलडीएआर 2021)

एलडीएआर 2021 के प्रस्तावित कार्यान्वयन के ख़िलाफ़ भी यहाँ आन्दोलन जारी है. लोग इस मसौदे के जनवाद विरोधी चरित्र की आलोचना कर रहे हैं. एलडीएआर 2021 के प्रावधानों के तहत सरकार, योजना और विकास प्राधिकरण या उसके किसी अधिकारी या उसके द्वारा नियुक्त या अधिकृत व्यक्तियों के ख़िलाफ़ कोई क़ानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती है. इसके मुताबिक प्रशासन कभी भी किसी भी घर की तलाशी बिना वारण्ट के ले सकता है. कड़े प्रावधान प्रशासक को किसी भी ज़मीन को विकास गतिविधियों के नाम पर चिह्नित करने का अधिकार देता है. जिसका उपयोग सरकार की इच्छा और महत्वाकांक्षा के हिसाब से हो सकेगा.

पशु संरक्षण अधिनियम

प्रशासक महोदय आम लोगों के खानपान में दखल देने का भी काम कर रहे हैं. लक्षद्वीप में, लोग आम तौर पर समुद्री भोजन पर निर्भर करते हैं, स्कूल में परोसे जाने वाले भोजन से मांसाहारी खाद्य पदार्थों को हटा दिया गया है. लेकिन “पशु संरक्षण अधिनियम” लाकर द्वीपों पर गोमांस के लिए वध तथा प्रसंस्करण को रोकने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है. दूसरी तरफ़, सैलानियों को लुभाने के लिए यहाँ शराब से प्रतिबन्ध हटा दिया गया है.

तटरक्षक अधिनियम

प्रशासन ने आम मछुआरों के जाल और अन्य उपकरण रखने के शेड को “तटरक्षक अधिनियम” के उल्लंघन का हवाला देते हुए ध्वस्त कर दिया है. आजीविका के लिए मुख्य रूप से मछली पकड़ने का व्यवसाय करने वाली अधिकांश द्वीपवासी के लिए यह अधिनियम किसी पीड़ा से कम नहीं है. सरकार के निशाने पर पूरा मछली व्यवसाय है. महामारी के कारण लोगों के रोज़गार की स्थिति ख़ासा ख़राब हो चुकी है. पर्यटन और कृषि जैसे सरकारी कार्यालयों में काम करने वाली आबादी का रोज़गार छिन गया है. 38 आँगनवाड़ी केन्द्रों को बन्द कर दिया गया है. 

मसलन, सारे प्रस्तावों को आरएसएस का खुला समर्थन प्राप्त है. आरएसएस ने अपने अंग्रेज़ी मुख्यपत्र ‘ऑर्गनाइज़र’ में दावा किया है कि 96 फ़ीसदी मुस्लिम आबादी वाले इस छोटे से द्वीप में इस्लामिक कट्टरपन्थी लोगों को प्रशासन के ख़िलाफ़ भड़का रहे हैं. विरोधियों को इस्लामिक कट्टरपन्थी बताते हुए प्रफुल्ल पटेल के समर्थन में कसीदे पढ़े गये हैं. आज आरएसएस का काम समाज में सिर्फ़ ज़हर बोना और नफ़रत की खेती करना है.  जिससे भाजपा सत्ता में बनी रहे और अपने पूँजीपति आक़ाओं की सेवा करती रहे. 

–केशव आनन्द

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