क्या भारत में लोकतंत्र का भी निजीकरण हो गया है?

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व्यवस्था

कांग्रेस के नरसिम्हा राव सरकार 1990 -91 में अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के नाम पर देश में पहली बार उदारीकरण और निजी की शुरुआत की। देशी-विदेशी पूँजी प्रवाह के लिए हजारों पूँजीपतियों को देश में उद्योग लगाने के लिए आमंत्रित किया गया। इसका कुछ पॉजिटिव परिणाम भी हुआ और औद्योगिक रूप से देश को एक विकासशील देश के रूप में पहचान मिली। तब उस व्यवस्था ने देश के सरकारी कल कारख़ानों के सामने प्रतिस्पर्धा का माहौल बनाया। 

लेकिन, वर्तमान में मोदी सत्ता जिस प्रकार से साज़िश के तहत निजीकरण के नाम पर तमाम देशी कल कारखाने व संस्थानों को अपने चहेते पूँजीपतियों को औने-पौने दामों में सौंप रही है। वह किसी भी प्रकार से लोकतंत्र के अनुकूल नहीं हो सकता है। अब भारतीय गन की कल्याणकारी व्यवस्था पूरी तरह से पूँजीपतियों के हाथों में देने का तैयारी हो चुकी है। और आज़ादी के बाद यह पहली बार है जब लोकतंत्र पर पूँजीपतियों का कब्ज़ा होते जा रहा है। 

देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को पूंजीवादी व्यवस्था में तब्दील कर दिया गया 

भारत का संविधान देश को एक समाजवादी कल्याणकारी देश घोषित करता है। जबकि वर्तमान सत्ता ने पूरी व्यवस्था को कल्याणकारी से पूंजीवादी व्यवस्था के मुनाफे में तब्दील कर दिया है। और भारत के 130 करोड़ जनता का भाग्य विधाता कमोवेश चंद पूँजीपतियों को बना दिया गया है। आज मोदी सत्ता में पुरानी व्यवस्था के सुदृढ़ीकरण के बजाय उसे हटा कर जितने भी नए कानून बने, वह आम जनता के कल्याण की जगह कुछ प्रतिष्ठित घराने और चहेते पूँजीपतियों की कल्याण करती है।

हालांकि, लोकतंत्र की लूट के लिए भ्रष्ट नेताओं व पूँजीपतियों का गठजोड़ चरम पर है। पहले तो इसका अप्रत्यक्ष उदाहरण छोटे चुनाव में भी करोड़ों रुपयों का इस्तेमाल हो सकता था। लेकिन, वर्तमान में जनता की गाढ़ी कमाई से खुलेआम विधायकों की ख़रीद-बिक्री इसका स्पष्ट उदाहरण है।   भारत की विविधता और जातियों के समीकरण में भारत की संपूर्ण राजनीति केवल एक दल के चंद प्रभावशाली लोगों के हाथों का खिलौना बन कर रह गया है। 

चूँकि नोटों के ज़बरदस्त इस्तेमाल से भारतीय राजनीति पूरी तरह से प्रभावित हो चुकी है। इसलिए 130 करोड़ जनता के लोकतंत्र में सामान्यता अपराधी और माफ़िया किस्म के बाहुबली आसानी से अपनी पैठ बना रहे हैं। और देश का चुनाव आयोग इब बड़ी घटनाओं पर लगाम लगाने के बजाय छोटे-छोटे राजनीतिक दलों अपनी पुरुषार्थ दिखाती रहती है। प्रथम आम चुनाव 1952 की चुनावी प्रक्रिया के तुलनात्मक विश्लेषण में जो तथ्य सामने आता है वह भारत को एक सफल लोकतंत्र के गुंजाइश पर प्रश्न चिन्ह अंकित करता है। 

नागरिक वोट की कीमत पहचाने

मसलन, किसी लोकतंत्र का चंद लोगों के हाथों का खिलौना बन जाना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। भारत के नागरिकों को गहराई से सोचना चाहिए कि कब तक ऐसे एकाधिकार वाले लोगों के हाथों में शासन और सत्ता देते रहेंगे। अगर वक्त पर यहां के नागरिकों ने अपने वोट के कीमत नहीं पहचाने और उसका उचित इस्तेमाल नहीं किया तो न देश बचेगा और न ही लोकतंत्र। ।।विद्रोही।।

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