किसान आन्दोलन मोदी सरकार को तीनों कृषि कानूनों के मोर्चे पर झुकाने में हुई सफल

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मोदी सरकार को तीनों कृषि कानूनों के मोर्चे पर झुकी

किसान, देश के पालनहार ने पहले दौर में औद्योगिक-वित्‍तीय बड़े पूँजीपति वर्ग पर तात्‍कालिक जीत हासिल की है. मोदी सरकार ने तीन कृषि कानूनों को वापस लेने का फैसला लिया. इस क़दम के कारण क्‍या हो सकते हैं? आइए देखते हैं :-

मेघालय के राज्‍यपाल सत्‍यपाल मलिक ने मीडिया के ज़रिये मोदी सरकार को यह सन्‍देश दिया था कि उत्‍तर प्रदेश के आगामी विधान सभा चुनावों में भाजपा की पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश में करारी हार होने वाली है. आरएसएस का ज़मीनी तंत्र भी भाजपा के नेतृत्‍व को ऐसी ही रिपोर्टें दे रहा था. सामान्‍य तौर पर उत्‍तर प्रदेश और ख़ासकर पूर्वी उत्‍तर प्रदेश में रोज़गार, खाद्य सुरक्षा और ग़रीबी के मोर्चे पर भाजपा सरकार की ख़राब हालत देखते हुए भाजपा को उत्‍तर प्रदेश की गद्दी छिनने का भय सता रहा है.

अगर ऐसा होता है तो 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा के जीतने की सम्‍भावना भी कम हो सकती है. इसलिए मोदी सरकार को तात्‍कालिक राजनीतिक ज़रूरतों की वजह से कृषि क़ानूनों को रद्द करने का फ़ैसला लेना पड़ा है. पूरे मामले का बस इतना मतलब है कि तात्‍कालिक रूप से खेतिहर बुर्जुआ वर्ग मोदी सरकार को कृषि क़ानूनों के मोर्चे पर झुकाने में सफल रहा. ग़ौरतलब है कि भाजपा के एक नेता श्रीमान जाटव जी ने अभी-अभी एनडीटीवी पर कहा है कि कुछ समय बाद कृषि क़ानूनों का कोई और संस्‍करण पेश किया जाएगा और तब तक ‘’सभी किसानों’’ को राजी कर लिया जाएगा! 

सरकार कृषि कानूनों पर ‘’किसानों के एक छोटे हिस्‍से’’ को राजी नहीं कर पायी : मोदी 

मोदी ने भी कहा कि चूँकि उनकी सरकार कृषि कानूनों पर ‘’किसानों के एक छोटे हिस्‍से’’ को राजी नहीं कर पायी, इसलिए वह कृषि क़ानूनों को वापस ले रही है! यह मोदी सरकार की मंशा की ओर साफ़ इशारा कर सकता है. बड़ी औद्योगिक-वित्‍तीय पूँजी देर-सबेर न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य (एमएसपी) के तंत्र को ध्‍वस्‍त करना चाहती है और मोदी सरकार किसी न किसी तरीक़े से फिर से ऐसा करने का प्रयास कर सकती है. जिससे स्‍पष्‍ट है, तात्‍कालिक राजनीतिक ज़रूरतों की वजह से मोदी सरकार ने कृषि क़ानूनों पर क़दम पीछे खींचा है.

ग़ौरतलब है कि इस बार पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश और ब्रज क्षेत्र बूथ मैनेजमेण्‍ट की दृष्टि से सीधे अमित शाह की निगरानी में है. इस वजह से भाजपा नेतृत्‍व पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश में कोई दाँव नहीं लगाना चाह रहा है. हरियाणा की तरह पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश में ग़ैर-जाट वोटों की लामबन्‍दी करने की सम्‍भावना नहीं है. इसकी वजह है पर्याप्‍त रूप से बड़ी मुस्लिम आबादी जिसे शायद ही भाजपा अपनी ओर कर पाये और अगर जाट वोट बैंक भी उसके हाथ से खिसक जाता है तो वह जाट-मुस्लिम अन्‍तरविरोध का फ़ायदा नहीं उठा सकेगी. इसलिए उनके लिए हरियाणा की तरह पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश में जाट वोट बैंक को नज़रअन्‍दाज़ करना भारी पड़ सकता है.

अलीगढ़ में भाजपा सरकार द्वारा एक विश्‍वविद्यालय का नाम बदलकर एक जाट राजा के नाम पर रखा गया 

पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश में जाटों की आबादी 17% है और इस क्षेत्र में मुस्लिम आबादी 25% है. हाल ही में भाजपा ने जाट और गुर्जर समुदाय के नेताओं को सम्‍मानित करके उनका तुष्टिकरण किया था. अलीगढ़ में एक विश्‍वविद्यालय का नाम बदलकर एक जाट राजा के नाम पर रखा गया है! भाजपा ने कृषि क़ानूनों को रद्द करने के साथ ही इन क़दमों को इसीलिए उठाया है ताकि जाटों के बीच उसके हाल के वर्षों में बने आधार में पड़ी दरारों को पाटा जा सके. दूसरे शब्‍दों में, उत्‍तर प्रदेश में भाजपा की जीत का रास्‍ता पश्चिमी उत्‍तर से होकर जाता है और लोक सभा में भाजपा की जीत का रास्‍ता उत्‍तर प्रदेश में जीत से होकर जाता है. 

ऐसे में टिकैत बन्‍धुओं को भी भाजपा का चुनावों में समर्थन करने या यहां तक कि इसके लिए प्रचार करने के लिए तैयार किया जा सकता है. इसके लिए भाजपा उत्‍तर प्रदेश विधान सभा चुनाव से पहले एक बार फिर से पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश में जाटों और मुस्लिमों के बीच साम्‍प्रदायिक तनाव भड़का सकती है, या फिर टिकैट बन्‍धुओं को कुछ अन्‍य लुभावने विकल्‍प दे सकती है. लेकिन केवल यही पहलू नहीं जिसपर भाजपा ने विचार किया। 

पंजाब में भाजपा के लिए कैप्‍टन अमरिन्‍दर सिंह तुरुप का पत्‍ता हो सकते हैं साबित 

दूसरा पहलू – पंजाब। वहाँ कृषि क़ानून लाने और फार्मर आन्‍दोलन के बाद भाजपा की स्थिति राजनीतिक रूप से अछूत जैसी हो गयी है. यह भाजपा के लिए बड़ी चिन्‍ता का विषय नहीं होता, लेकिन उत्‍तर प्रदेश चुनावों में सम्‍भावित हार के साथ मिलकर यह भाजपा के लिए और ज्‍़यादा नुक़सान की बात बन जाएगी. तीन कृषि क़ानूनों को रद्द करने के बाद पंजाब में राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं.पंजाब में भाजपा के लिए कैप्‍टन अमरिन्‍दर सिंह तुरुप का पत्‍ता साबित हो सकते हैं जिन्‍होंने तुरन्‍त मोदी सरकार को ट्वीट करते हुए लख-लख बधाइयाँ भेजीं! 

अमरिन्‍दर सिंह यह बयान देते आये हैं कि वह भाजपा सरकार को कृषि कानूनों को रद्द करने के लिए राजी करने के प्रयास कर रहे हैं. अब अमरिन्‍दर सिंह खुले रूप में या पर्दे के पीछे भाजपा के सहयोगी बन सकते हैं क्‍योंकि अब भाजपा की स्थिति पंजाब में राजनीतिक अछूत वाली नहीं रह जाएगी. अमरिन्‍दर सिंह जैसे मित्रों की सहायता से पंजाब में भाजपा के लिए बन्‍द हो चुका दरवाज़ा फिर खुल सकता है. आज के भाषण में मोदी ने गुरुपरब के मौक़े पर सिख धर्मग्रन्‍थ से उद्धृत करके सिखों की धार्मिक भावनाओं का तुष्टिकरण करने की कोशिश भी की है. जिसकी राजनीतिक मायने हो सकते हैं.

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