झारखण्ड : खान लीज मामले ने रघुवर दास-बाबूलाल मरांडी के आपसी लड़ाई को लाया सतह पर

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चूँकि 9(ए) के तहत माइनिंग लीज मामला सप्लाई ऑफ गुड्स बिजनेस के तहत नहीं आता रिटायर्ड जस्टिस के अनुसार सीएम की बर्खास्तगी नहीं हो सकता. लेकिन इस मामले ने बाबूलाल मरांडी-रघुवर दास के बर्चस्व की आपसी लड़ाई को सतह पर ला दिया है. 

रांची : झारखण्ड में प्रदेश भाजपा में बर्चस्व की लड़ाई सरेआम हो चुकी है. एक तरफ पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास पार्टी में फिर से बर्चस्व चाहते हैं तो दूसरी तरफ जेवीएम समेत भाजपा में गए बाबूलाल मरांडी मौकापरस्ती के मद्देनजर पार्टी में अपना दबदबा बढ़ाना को बेताब हैं. मसलन, मुद्दा चाहे बेतुका ही क्यों ना हो दोनों ही अपनी श्रेष्ठता को साबित करने राजनीति के मैदान में कुद पड़ते हैं. चाहे उस मुद्दे में उनका ग्राफ खराब ही क्यों न हो. झारखण्ड के कई समस्याओं के मूल में तो यही महानुभाव रहे हैं.

ज्ञात हो, मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन पहले ही अपने चुनावी हलफनामा में खान लीज का जिक्र कर चुके हैं और यह मामला ऑफगुड्स बिजनेस में नहीं आता. 1964 में सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की खंडपीठ ने स्पष्ट कहा है कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 9(ए) के तहत माइनिंग लीज का मामला सप्लाई ऑफ गुड्स बिजनेस के तहत नहीं आता. मसलन, इस मुद्दे में बाबूलाल मरांडी व रघुवर दास का जोर अजमाइस केवल उनकी महत्वाकांक्षा और कौन बड़ा नेता है की बर्चस्व की आपसी लड़ाई, का प्रदर्शन भर हो सकता है.

रिटायर्ड जस्टिस ने स्पष्ट कहा कि ऐसे मामले में सरकार की बर्खास्तगी नहीं हो सकता

सीएम हेमन्त सोरेन पर लगा खदान लीज मामला वर्तमान में भारत निर्वाचन आयोग के पास है. और आयोग के फैसले पर सबकी निगाहें जमी है. सरकार भी कानून के जानकारों से राय ले रही है. सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस अशोक कुमार गांगुली द्वारा निजी टीवी चैनल में दिये गये इंटरव्यू में कहा गया है कि खनन लीज मामले में हर पहलू को देखने की जरूरत है. रिटायर्ड जस्टिस ने स्पष्ट कहा कि ऐसे मामलों में सरकार की बर्खास्तगी नहीं हो सकता. इस सन्दर्भ में उनके द्वारा सुप्रीम कोर्ट के तीन जजमेंट का हवाला दिया गया है.

चिंकी खान लीज मामला ऑफगुड्स बिजनेस में नहीं आता. रिटायर्ड जस्टिस ने कहा कि सीवीके राव बनाम दत्तू भसकरा -1964 में सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की खंडपीठ ने स्पष्ट कहा है कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 9(ए) के तहत माइनिंग लीज का मामला सप्लाई ऑफ गुड्स बिजनेस के तहत नहीं आता. ऐसे में यदि सरकार गिरने-बदलने और राष्ट्रपति शासन लगने जैसी अटकलों को भाजपा हवा दे रही तो इसे शाजिस के तहत देखा जा सकता है.

माइनिग लीज के मामले में मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन अयोग्य करार दिये जा सकते हैं?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन संघर्ष के बाद बाहर आ जाएंगे. वहीं कानून के जानकार संवैधानिक दृष्टि से हेमन्त सरकार के भविष्य का आकलन कर रहे हैं. इस संबंध में उठ रहे सवालों पर हिन्दुस्तान के ब्यूरो चीफ सत्यदेव यादव ने भी सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त जस्टिस अशोक गांगुली से बात की है. 

खान लीज मामले को इस तरह से समझना होगा कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 9(ए) की दो मुख्य शर्ते हैं. किसी सरकार को सामान (गुड्स) की आपूर्ति या सरकार द्वारा लिये गये काम को किये जाने की संविदा (कांट्रैक्ट) होना जरूरी है. तभी कोई व्यक्ति विधायक अथवा सांसद होने से अयोग्य हो सकता है. इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तीन-तीन निर्णय दिये गये हैं.

– सीवीके राव बनाम देंतु भास्करा राव, श्रीकांत बनाम बसंत राव एवं अन्य और करतार सिंह भड़ाना बनाम हरि सिंह नलवा व अन्य. इन तीनों निर्णयों में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि माइनिंग लीज ऐसी संविदा नहीं है, जिसकी चर्चा धारा-9(ए) में की गई है. इसलिए माइनिंग लीज के आधार पर मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन को अयोग्य करार देना गलत होगा.

सवाल : अयोग्य करार देने पर कानूनी विकल्प क्या होंगे?

जवाब: माइनिंग लीज के मामले में 9 (ए) लागू नहीं होता है. इसके बावजूद अगर राज्यपाल द्वारा उन्हें अयोग्य करार दिया जाता है तो वह सक्षम न्यायालय के समक्ष इस निर्णय को चुनौती दे सकते हैं. अयोग्य करार देने पर भी सरकार नहीं गिरेगी, बशर्ते मुख्यमंत्री को सदन का बहुमत प्राप्त रहे. उन्होंने बीआर कपूर बनाम तमिलनाडु राज्य में सर्वोच्च न्यायालय के पांच जजों की खंडपीठ का एक फैसला 2001 संदर्भित किया. इसमें जे जयललिता को तानसी मामले में दोषी करार दिया गया था.  इसके बाद राज्यपाल द्वारा एआईडीएमके विधायक दल की नेता गई. उन्हें मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई.

लेकिन हेमन्त सोरेन यह मामला से भिन्न है. जयललिता को आपराधिक मामले में सजा सुनाई गई थी. लोक प्रतिनिधित्व की धारा-8 के अंतर्गत ऐसे मामलों में सजायाफ्ता व्यक्ति अगले छह वर्षों के लिये चुनाव लड़ने से अयोग्य हो जाता है. वहाँ धारा-9 (ए) की अयोग्यता का कोई अनुगामी प्रभाव (सब्सिक्वेंट इफेक्ट) नहीं है, मसलन, मुख्यमंत्री को मामले के अंतर्गत अयोग्य करार देने के बाद भी मुख्यमंत्री का पद धारित करने की योग्यता बनी रहेगी.

मसलन, ऐसा होने पर भाजपा के दोनो बड़े नेता बाबूलाल मरांडी व रघुवर दास के महत्वकांक्षा को झटका लग सकता है. और खान लीज मामले के आलोक में इन दोनों बड़े नेताओं की आपसी लड़ाई जो खुलकर सतह पर आ चुकी है, आने वाले दिनों में और परवान चढेगी. एक तरफ बाबूलाल जी के मजबूत साथी के रूप में दीपक प्रकाश है तो दूसरी तरफ माना जा रहा है की रघुवर दास के सर पर गृह मंत्री अमित शाह का हाथ है. आने वाले दिनों में देखना दिलचस्प होगा यह बर्चस्व की आपसी लड़ाई क्या रूप लेती है.   

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