लड़ाई

झारखंडियों के अधिकारों के लिए केंद्र से सीधी लड़ाई लड़ रहे हैं हेमंत सोरेन

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कोल ब्लॉक नीलामी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुँच हेमंत ने पेश की मिसाल

2500 करोड़ रूपये जीएसटी बकाये केंद्र द्वारा नहीं अदा करने पर सहकारी संघवाद पर पहुँचेगा चोट  : हेमंत

राँची : विपक्ष से मुख्यमंत्री बनने तक जेएमएम कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन ने हर मंच पर झारखंडी अधिकारों की बात प्रमुखता से उठाते रहे हैं। जिसका उद्देश्य भी साफ है – झारखंडी जनता को गरीबी रेखा से उपर उठा कर उन्हें मूलभूत सुविधाएँ प्रदान कराना। लेकिन, वहीँ दूसरी तरफ केंद्रीय सत्ता अपने चहेते पूंजीपतियों को इस राज्य का खनिज- सम्पदा व संसाधन को लूटाने पर अमादा है।  जिससे यह पिछड़ा राज्य और भी गर्त में चला जाएगा। 

जाहिर है केंद्र के इस तानाशाही रवैये से सहकारी संघवाद की भावना को गंभीर ठेस पहुंचेगा। कोरोना संक्रमण जैसे संकट के वक़्त जब राज्य सरकार इससे निबटने के लिए जूझ रही थी। तो शाजिसन बिना राज्य सरकार के परामर्श के कोल ब्लॉक नीलामी की प्रकिया आरम्भ किया। साथ ही ऐसे नाज़ुक वक़्त में जब झारखंड को सहारे की जरुरत है तब जीएसटी बकाये राशि का भुगतान केंद्र द्वारा नहीं करना निश्चित रूप से संघीय ढ़ांचे पर चोट करने के समान है। 

सीएम केंद्र सरकार के छुपे मंशे को समझते हैं 

केंद्र ने राज्य सरकार से बिना विचार-विमर्श के वाणिज्यिक खनन के लिए कोल ब्लॉक की नीलामी प्रक्रिया की पहल की। सीएम सोरेन समझ रहे थे कि केंद्र के इस पहल से झारखंडी जनता अपने अधिकारों से बंचित होगे। इसलिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। नीलामी प्रक्रिया को टालने में सरकार सफल हुई। 

हेमंत का स्पष्ट कहना है कि बिना सामाजिक-आर्थिक-पर्यावरण सर्वे के नीलामी शुरू करना वनों और आदिवासी आबादी की घोर उपेक्षा है। और इसमें पारदर्शिता का अभाव होना दर्शाता है कि केंद्र का निर्णय संघीय ढाँचे के विपरित है। साथ ही केंद्र द्वारा राज्य के हिस्से का बकाये जीएसटी राशि का भुगतान में टालमटोल का रवैया अपनाना इसी सच को उभारता है। ज्ञात हो कि झारखण्ड के मुख्यमंत्री द्वारा इस सम्बन्ध में प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर वस्तुस्थिति से अवगत भी कराया जा चूका है। 

झारखंडी अधिकारों के लिए सीएम की लड़ाई दिखा रहा है असर

कोल ब्लॉक नीलामी प्रक्रिया के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना हो या जीएसटी के बकाया राशि की मांग, हेमंत ने यह बता दिया है कि वे झारखंडी अधिकारों की लड़ाई के अगुवा सिपाही हैं। हेमंत ने केंद्रीय कोयला मंत्री के समक्ष कोल इंडिया समेत अन्य खनन कंपनियों पर बकाया 65 हजार करोड़ रूपये के भुगतान का मुद्दा प्रमुखता उठा इसी सच का परिचय दिया है। 

हेमंत के मांग का ही असर है कि राज्य गठन के बाद पहली बार बकाया राशि के 298 करोड़ रूपये का भुगतान केंद्र द्वारा किया गया। इसी प्रकार उन्होंने झारखंडी जनता के अधिकार, राज्य के 7 लौह अयस्क खनन कंपनियों को राज्य के लिए रिजर्व कर अपने इरादे को मज़बूती से राज्य के समक्ष रखा है।

जीएसटी मुद्दें पर भी लगातार आवाज़ उठा रहे है हेमंत

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन कई माह से राज्य के जीएसटी बकाये के भुगतान को लेकर केंद्र से सीधी लड़ाई लड़ रहे हैं। राज्य में दस्तक देते आर्थिक संकट को देखते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री को इस मुद्दे पर पत्र भी लिखा है। इस संबंध में उनका कहना है कि केंद्र के पास राज्य का जीएसटी का कुल 2500 करोड़ रूपये का बकाया है। और केंद्र द्वारा जीएसटी मुआवजे की भरपाई नहीं करना राज्य और केंद्र के बीच विश्वास में कमी लाएगी। 

ज्ञात हो कि जीएसटी लागू किए जाने के वक़्त केंद्र ने राज्यों से उनके अधिकारों को नहीं छिनने की बात बात कही थी। लेकिन, बीजेपी के झारखंड चुनाव में जनता द्वारा पटकनी खाने के बाद केंद्र नयी हेमंत सरकार की माँगों को नजरअदांज करती रही है। हालांकि, हेमंत सोरेन कई मौकों पर स्पष्ट कह चूके है कि झारखंड के अधिकारों को वे लड़कर भी लेंगे। 

बीजेपी के तर्क कुछ भी कहे, लेकिन रघुवर के नीतियों से राज्य पड़ा है कर्ज का बोझ

झारखंडी अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हेमंत सोरेन पर प्रदेश बीजेपी इकाई लगातार हमलावर है। उनके मुताबिक हेमंत सरकार झारखंडी जनता को धोखा दे रही है। उनका यह भी दलील है कि कोल ब्लॉक नीलामी से झारखंड में रोज़गार के नए अवसर पैदा होंगे और राजस्व में भी बढ़ोत्तरी होगी। लेकिन, प्रदेश बीजेपी के इस तर्क का खंडन रघुवर सरकार के नीतियों के परिणाम स्वयं ही करती आयी है। 

रघुवर सरकार राज्य की पहली ऐसी सरकार थी, जिसने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। कार्यकाल के दौरान उस सरकार ने रोज़गार देने के नाम पर कई आडम्बर रचे। सच्चाई यह है कि राज्य के युवाओं को रोज़गार तो नहीं मिले, लेकिन राज्य के ज़मीन व संसाधनों की लूट पटकथा ज़रुर तैयार हुई। फ़ेहरिस्त इतनी लंबी है कि किताब लिखी जा सकती है।

राजस्व बढ़ने का तर्क देने वाले प्रदेश बीजेपी नेता यह बताना भूल जाते है कि रघुवर राज के नीतियों के कारण झारखंड में प्रति व्यक्ति कर्ज बढ़कर 24486 रुपये हो चुके हैं। आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20 में यह बात सामने आयी थी। और वह कुल बजट का 27.1 फीसदी है। सर्वेक्षण के मुताबिक राज्य सरकार पर करीब 92864.5 करोड़ रुपये का कर्ज है। 

बहरहाल, राज्य के मुख्यमंत्री का झारखंड के हित में केंद्र से जीएसटी बकाया राशि की मांग और कोल ब्लॉक नीलामी के खिलाफ डटकर खड़ा होना एक सवास्थ लड़ाई मानी जा सकती है।

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