झारखंड भाजपा को निंदा तो दिखती है, मगर झारखंडियों के साथ हो रहे सौतेला व्यवहार नहीं दिखता, ऐसे ख़ामोशी में क्या एक सीएम जनता को मरते देखे

बाबूलाल जी का स्वार्थी महत्वाकांक्षा

मोदी सरकार ने तो बांग्लादेश से मंगा लिया रेमडेसिवीर, जब हेमंत सरकार अपने खर्च पर खरीदने को तैयार है, तो केंद्र की ख़ामोशी क्यों?

दलबदलू नेता बाबूलाल मरांडी और उनके सलाहकार की अपंग मानसिकता से ओत-प्रोत राजनीति को झारखंड महसूस कर रहा है

रांची: समाज में प्रचलित कहावत है – सच कडवा होता है. और जब किसी के गलत नियत को उजागर किया जाता है. और यदि वह तानाशाह हो तो वह सत्य उसे व उसके समर्थक के लिए अधिक कड़वा हो जाता है. ऐसी ही कुछ स्थिति मौजूदा दौर में केंद्र समेत तमाम झारखंडी बीजेपी नेताओं की है. दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीति व निरंकुश कार्यशैली पर, झारखंड प्रदेश के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने वाजिब सवाल उठाया, तो बीजेपी नेता मर्यादा का राग अलापने लगे. जबकि भाजपा नेताओं को मर्यादा व अधिकार के प्रति आवाज उठाने के बीच का अर्थ का भी ज्ञान नहीं है. 

मर्यादा का सम्बन्ध आचार-व्यवहार होता है. और अधिकार के प्रति आवाज उठाने का संबंध आम जनता के जीवन जीने के अधिकार से जुड़ा होता है. बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष दीपक प्रकाश का मानना है कि हेमंत सोरेन के उठाये सवाल की निंदा हो रही है. ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि मौजूदा प्रधानमंत्री के दौर में कोई मुख्यमंत्री जनता के हक में सवाल उठाये, तो उसे कैसे मर्यादा विहीन माना जा सकता है. वह भी तब जब केंद्र 16 महीनों से झारखंड के साथ सौतेला व्यवहार कर रहा हो.

ऐसे में महत्वपूर्ण सवाल हो सकता है कि दीपक प्रकाश जैसे नेता के राजनीति को कैसे आँका जाए. जहाँ उसे हक-अधिकार के मांग में मर्यादा भंग तो दिखती है. लेकिन, जनता के जीवंत सवाल के मद्देनजर झारखंड के साथ निरंतर उस केन्द्र द्वारा आपदा की इस घड़ी में भी होने वाला सौतेला व्यवहार, रेमडेसिवीर को लेकर ख़ामोशी नहीं दिखता. जब दीपक प्रकाश जैसे भाजपा नेता राजनीति में, नैतिक मर्यादा की धुंधली लकीर का भी तिलांजलि दे दे. तो एक संवेदनशील मुख्यमंत्री मझधार में जनता को मरने के लिए निसहाय कैसे छोड़ दे. वह भी तब जब बाबूलाल मरांडी सरीखे भाजपा नेताओं की असलियत का भी भान जनता को भली-भांति हो. 

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को मर्यादा की परख थी तभी उन्होंने प्रधानमंत्री के लिए आदरणीय शब्द का प्रयोग किया 

ज्ञात हो, प्रधानमंत्री ने गुरुवार को कुछ राज्यों के मुख्यमंत्रियों से फोन पर बात करके कोरोना महामारी की स्थिति की जानकारी ली. इसी क्रम में पीएम ने झारखंड के मुख्यमंत्री को भी फोन किया. हेमंत सोरेन ने ट्वीट कर जानकारी दी। साथ ही उन्होंने ट्वीट में प्रधानमंत्री पर एकतरफा बातचीत करने का आरोप लगाया. 

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने ट्वीट में कहा कि ‘आज आदरणीय प्रधानमंत्री जी ने फोन किया। उन्होंने सिर्फ अपने मन की बात की। बेहतर होता यदि वो काम की बात करते और काम की बात सुनते।’  बीजेपी को शायद एक आंदोलनकारी खून की तासीर नहीं पता. उनका पूरा जीवन जनता के सुख-दुःख को समर्पित होता है. ऐसे में उन्हें झारखंडियों को मर्यादा नहीं सिखानी चाहिए. मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री के लिए आदरणीय शब्द का प्रयोग कर अपनी व्यथा जनता के समक्ष  रखा है. जो जनता का अधिकार भी है.

रेमडेसिवीर पर केंद्र का सौतेला व्यवहार, इस पर दीपक प्रकाश जैसे नेता केंद्र की निंदा क्यों करते 

दीपक प्रकाश जैसे नेता को क्यों भान नहीं कि उनके ही पार्टी द्वारा झारखंड के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है. एंटी वायरल इंजेक्शन रेमडेसिवीर को अपने खर्च पर बांग्लादेश से खरीदने के लिए मुख्यमंत्री ने मर्यादा के तहत ही केंद्र से अनुमति मांगी थी। लेकिन अनुमति देना तो दूर लगातार ख़ामोशी बरता गया, बाबूलाल जैसे दलबदलू नेता यह कहने से नहीं चूके कि किसी कंपनी ने कोई आवेदन नहीं दिया है. लेकिन आज उसी बांग्लादेश ने केंद्र सरकार को 10,000 इंजेक्शन सौंपा है. यह सौतेला व्यवहार नहीं तो और क्या है. ऐसे में दीपक प्रकाश की जीह्वा क्यों अपने आका की निंदा नहीं करती है. क्योंकि झारखंडी भाजपा नेताओं के लिए झारखंडियों से ज्यादा अपने आका नेताओं को खुश करना जरूरी है.

बाबूलाल के झारखंड विरोधी राजनीति में उनके सलाहकार सुनील तिवारी की संलिप्तता भी आज छिपी नहीं है 

रेमडेसिवीर इंजेक्शन मामले में केंद्र द्वारा बरती जा रही ख़ामोशी के मद्धेनाजर, बाबूलाल की झूठ की राजनीति का पर्दाफाश झारखंड के प्रति उनकी जवाबदेही को उजागर करता है. साथ ही उनके सलाहकार सुनील तिवारी की झारखंड के प्रति निष्ठा को भी. ऐसा बयान देने से पहले उन्होंने नहीं सोच कि अगर केंद्र हेमंत सरकार को बांग्लादेश से इंजेक्शन खरीदने की अनुमति देता, तो झारखंड में कई जाने बचाई जा सकती थी. लेकिन उस शख्स से क्या उम्मीद किया जा सकता है. जिसका राजनीतिक जीवन ही दल-बदल पर निर्भर हो. मसलन, झारखंड के  3.30 करोड़ जनता का सही निर्णय है. जिन्हें इनपर भरोसा नहीं दिखाया.

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