जैक अध्यक्ष का सच

जैक अध्यक्ष का सच – संघ के पसंदीदा की नियुक्ति में भ्रष्टाचार की नयी परिभाषा

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जैक अध्यक्ष का सच – संघ के पसंदीदा की नियुक्ति के मद्देनजर भ्रष्टाचार की नयी परिभाषा जिसके अक्स में हर मंजिल काली मुनाफे के डगर से ही गुजरती है    

तो क्या मोदी सत्ता के 6 वर्ष बाद ही राजनीतिक सत्ता के आकूत ताकत में संस्थानों के ढहने के मद्देनजर, लोकतंत्र की मूल परिभाषा में बदलाव ला चुकी है। यानी मुनाफा से जुड़ी आरएसएस के जिस समझ के आसरे, भारत भाग्य विधाता को पूंजी के धागे में पिरोने की नई बौद्धिक परम्परा की शुरुआत हुई।  वह लोकतंत्र के मूल लकीरों को मिटाने का सच उभारने लगा है। कॉलेजियम के जरिये न्यायाधीशों की नियुक्ति। कॉर्पोरेट पूंजी के आसरे संस्थानों की नयी परिभाषा। असर इसी का हो जहाँ कामगार यूनियनें बेईमानी और किसानों से जुड़े सवाल झटके में खारिज हो गए। और ज्ञान-सर्टिफिकेट से लेकर नियुक्तियों की तमाम मंजिलें काले मुनाफे की डगर से होकर गुजरने का सच बन गए।   

नवोदय विद्यालय। सीबीएसई बोर्ड। देश के 45 केन्द्रीय विश्वविद्यालय। उच्च शिक्षा के संस्थान। आईआईटी। आईआईएम। पब्लिक सर्विस कमीशन। इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च सेंटर। एनसीईआरटी। यूजीसी। राज्य शिक्षा बोर्ड। हर जगह को उस समझ के अधीन लाने की मशक्कत ने संस्थानों की स्वायत्तता, उसकी मूल मंशा के खात्मे का सच लिए सामने है। जहाँ बोर्ड में ज्ञान की परिभाषा विचारधारा से जोड़कर देखी जाने लगे। जहाँ वह समझ सांस्कृतिक महान शिक्षा पद्धति के चोले में पश्चिमी सोच की एफडीआई शिक्षा का हामी भरे। तो युवा समझ लें यह नयी उलझन उज्जवल भविष्य के मद्देनजर संकट उभार सकती है। 

गुड गवर्नेंस को झटके में सांस्कृतिक और राष्ट्रवाद के आईने में उतारने की संघ की कवायद केवल छलावा 

लेकिन संकट इतना भर का नहीं आगे का है। नयी परम्परा की शुरुआत संविधान के उस मूल डोर के खात्मे के पहल का सच भी उभार रहा है जिससे जुड़े बगैर नागरिक विकास बेमानी है। जो हर संस्थान के बोर्ड में संघ के पसंदीदा की नियुक्ति के मातहत गुड गवर्नेंस झटके में सांस्कृतिक और राष्ट्रवाद के आईने में उतारने की कवायद में बदल गयी। और पता तब चलता है जब सांस्कृतिक व राष्ट्रवाद की वह परिकल्पना नयी पीढ़ी के शिक्षण, उसके भविष्य को लीलने पर आमादा हो जाए। जहाँ धन से लेकर बच्चों के मन तक एक ही विचारधारा के काबिज होने की जद्दोजहद, देश के लोकतांत्रिक भविष्य को काले मुनाफे के आसरे चुनिंदे भविष्य में गढ़ने का नया संकट खड़ा कर दिया है। 

झारखंड में आरएसएस बैकग्राउंड के जेक अध्यक्ष पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप 

तो मौजूदा दौर में झारखंड जैसे आदिवासी बाहुल्य राज्य के विधायक सुदिव्य कुमार, जैक अध्यक्ष अरविंद सिंह पर सिस्टम से ऊपर मानने का सवाल उठाये। तो यह आश्चर्य नहीं मौजूदा सत्ता व जनता के लिए संकट का संकेत हो सकता है। यह पहली बार नहीं है जब आरएसएस बैकग्राउंड से आने वाले पदधारी पर गंभीर आरोप लगे हों। पूर्व की सरकार की मेहरबानी में मैट्रिक व प्लस-टू के टॉपरों की लिस्ट में फेरबदल के आरोप हैं। जहाँ मिठाई बांटने वाला टॉपर महज तीन दिन में पांचवें-सातवें स्थान पहुँच जाता है। जैक के कर्मचारी का पत्र लिख अध्यक्ष व सचिव महिप सिंह पर पूरे सिस्टम का हाइजैक करने जैसे आरोप लगाए। तो वित्तीय अनियमितता के बड़े सवाल हो सकते हैं। 

ज्ञात हो, जैक स्वशासी परिषद सदस्य गिरिडीह विधायक सुदिव्य कुमार और महगामा विधायक के पांच माह से परिषद की बैठक हेतु लगातार पत्र लिखने के बावजूद बैठक नहीं बुलाया जाना, राज्य में शिक्षा सुधार के मद्देनजर गंभीर सवाल हैं। ऐसे में विधायक सुदिव्य कुमार का बयान – जैक में जो चल रहा है, ठीक नहीं है। जैक का बोर्ड बैठक नहीं बुलाना गड़बड़ी का संकेत है। जैक के अध्यक्ष का 350 करोड़ के फंड विचलन के सम्बन्ध में जानकारी नहीं कहना। बड़ी वित्तीय अनियमितता का सच लिए हो सकता है। मसलन, सरकार को जल्द मुद्दे पर संज्ञान लेना चाहिए। अन्यथा राष्ट्रवाद व सांस्कृतिक के चोला ओढ़े यह सोच झारखंड की शिक्षा व्यवस्था को लील जायेगा।

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