हेमंत के अपील पर विपक्ष एकजुट हों तो फिर से दोहराया जा सकता है 2004

Share on facebook
Share on telegram
Share on twitter
Share on whatsapp
हेमंत

हेमंत के अपील पर विपक्ष एकजुट हों तो फिर से दोहराया जा सकता है 2004

हेमंत ने कहा, “मोदी सरकार की गलत नीतियों के विरोध के लिए विपक्ष की एकजुटता जरूरी”

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी सहित गैर बीजेपी शासित 6 मुख्यमंत्रियों के साथ बातचीत में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने जो बातें कहीं है। उसकी शायद किसी ने परिकल्पना भी नहीं की होगी। श्री सोरेन ने कहा है कि देश का विपक्ष अभी कमजोर दिख रहा है। लेकिन यदि हेमंत के अपील से यदि पूरा विपक्ष में सहमति बनती है। और  विपक्ष को एकजुट होकर केंद्र के खिलाफ खड़ा किया जाए तो, यह कहने में थोड़ी सी भी हिचक नहीं होगी कि फिर से 2004 के लोकसभा चुनाव सा मंजर दोहराया जा सकता है। 

हालांकि, उसके कथन के कई अर्थ निकाले जा सकते हैं, लेकिन ज्ञात हो कि 2004 में ही कांग्रेस की अगुआई में पहली बार संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) बना था। विपक्षी गठबंधन ने उस शख्यिसत को केंद्र की सत्ता से बेदखल किया था जिसने भारतीय राजनीति में इतिहास रचा था। हम बात कर रहे है, केंद्र में पहली बार 5 साल तक के गैर काँग्रेसी पीएम अटल बिहारी वाजपेयी की।

उस वक़्त के बीजेपी भी कुछ कम नहीं थी, लेकिन संयुक्त विरोध ही हावी रहा 

एनडीए के नेता रहे अटल बिहारी वाजपेयी भी भारतीय राजनीति के एक चर्चित शख़्सियत

थे। उन्होंने 1999 के लोकसभा चुनावों में 34 राजनीतिक दलों को मिलाकर न केवल सत्ता पायी, बल्कि पांच वर्ष चलाया भी। वाजपेयी की ताकत देखकर उस वक़्त भी माना जा रहा था कि 2004 के चुनाव में भी एनडीए सरकार ही सत्ता में काबिज़ होगी। लेकिन संयुक्त विपक्ष ने तत्कालीन एनडीए सरकार के गलत नीतियों को जनता के समक्ष जोरदार ढंग से उठाया। इसका फायदा भी हुआ। कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार सत्ता में आयी।

हेमंत सोरेन का बयान वापस ला सकता है यूपीए का दिन 

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा कि केंद्र सरकार की गलत व पूंजीवादी समर्पित नीतियों के कारण  हमेशा विपक्ष व राज्य सरकारों के बीच भेदभाव दिखता है। लेकिन वर्तमान में विपक्ष कमजोर दिखने के कारण वह जनता तक उन गलत नीतियों को पहुंचा नहीं पा रही है। हमें एकजुट होकर केंद्र की ग़लत नीतियों का विरोध करना होगा। 

मुख्यमंत्री सोरेन ने इसके लिए एक विपक्ष का संयुक्त कार्यक्रम चलाने की भी अपील किए। निस्संदेह हेमंत के इस सोच में इतनी ताकत है कि अगर कांग्रेस की अगुवाई में गैर बीजेपी राजनीतिक दल एकजुट होते हैं, तो यूपीए के पुराने दिन वापस लौट सकते हैं।

आंकड़ों को देखा जाए, तो हेमंत की अपील ला सकती है रंग

अब आंकड़ों की बात करते हैं। 1999 के लोकसभा चुनाव के पूर्व 1998 में तत्कालीन बीजेपी नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एडीए) का गठन किया। जिसका उद्देश्य कांग्रेस को सत्ता से हटाना था। जब एनडीए बना, तो उस वक्त देश की छोटी-बड़ी कुल 34 राजनीतिक पार्टियों में शामिल थी। जाहिर है कि उस समय विपक्ष में बीजेपी ने खुद को विपक्षी दलों के साथ एकजुट किया था। 

2004 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की अगुवाई में यूपीए का गठन किया गया। यूपीए में उस समय विपक्ष के करीब 15 राजनीतिक दल शामिल थे। लोकसभा के 543 सीटों के लिए हुए चुनावों में कांग्रेस 145 सीट ही जीत सकी थी, लेकिन सहयोगी दलों के साथ मिलकर कांग्रेस संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन को यूपीए सरकार बनाने में कामयाबी मिली। 

इस गठबंधन में बहुजन समाज पार्टी (बसपा), मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) जैसे दल शामिल थे, जिन्हें यूपीए में रहने का फायदा मिला। चुनाव में सीपीएम को 43, बसपा को 19, सीपीआई को 10 और एनसीपी को 9 सीटें जीती थीं।

Leave a Replay

DON’T MISS OUT ON NEW POSTS

Don’t worry, we don’t spam. Click button for subscribe.