झारखण्ड: फर्जी जाति प्रमाणपत्र के आसरे जनप्रतिनिधि बनना भाजपा के बड़े-छोटे नेताओं की नियति

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झारखण्ड : गिरिडीह मेयर, RMC पार्षद, कांके विधायक समरीलाल के बाद अब फर्जी जाति प्रमाणपत्र के फेहरिस्त में पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान केंद्रीय मंत्री अर्जून मुंडा. यदि तमड़िया एसटी सूची में शामिल नहीं, तो कैसे बने अर्जुन मुंडा जनप्रतिनिधि?

राँची : भाजपा व उसके नेता एक तरफ दावा करती है कि उसकी पार्टी की विचारधारा लोकतांत्रिक है और संवैधानिक मूल्यों पर भरोसा करती है. तो दूसरी तरफ संघ देश के अनुसूचित जातियों के हिमायती होने का दंभ भारती रही है. लेकिन, यदि भाजपा-संघ की विचारधारा अनूसूचित जाति-जनजातियों के हक-अधिकार के हनन के ज़मीनी सच लिए धरातल पर खड़ी ही. भाजपा नेताओं का सच ही लोकतंत्र के मूल्यों को खत्म करने की मंशा लिए हो. तो भाजपा के अनुसूचित जाती-जनजाति के दावे की हकीकत समझी जा सकती है.

ज्ञात हो, भाजपा-संघ का सच अबतक धर्म-जाति में विभेद के आसरे हिदुस्तानी भावना में फूट डालने सामने थी. लेकिन, अब षड्यंत्र के आसरे लोकतांत्रिक मूल्यों को खत्म करने का सच भी सामने आया है. झारखण्ड में भाजपा पर अपने नेताओं को फर्जी प्रमाण पत्र के सहारे लोकसभा-विधानसभा चुनाव लड़ाने का सच आमने आया है. और यह सच भाजपा के किसी एक नेता नहीं, बल्कि कई नेताओं के नाम जा जुड़ा है. फर्जी प्रमाण पत्र में फर्जी जाति प्रमाणपत्र, चुनावी हलाफनामे में गलत जानकारी देना शामिल हैं. 

ऐसे नेताओं की श्रेणी में झारखण्ड प्रदेश में तीन बार पूर्व मुख्यमंत्री रहे और वर्तमान केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा, कांके विधायक समरी लाल, गिरीडीह मेयर सुनील पासवान, रांची नगर निगम के वार्ड पार्षद वेद प्रकाश यादव सरीके नेता शामिल हैं. मसलन, तमाम आरोपों के मद्देनजर कहा जा सकता है कि फर्जी जाति प्रमाणपत्र के आसरे जनप्रतिनिधि बनाना-बनना प्रदेश भाजपा व् उसके के बड़े-छोटे नेताओं की नियति है. और यह तभी संभव हो सकता है जब भाजपा का बाईलॉज़ इसकी सहमती प्रदान करता हो.

तमड़िया यदि एसटी सूची में शामिल नहीं, तो अर्जुन मुंडा विधायक-सांसद कैसे बने?

ज्ञात हो, केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा पर आरोप है कि उन्होंने गलत जाति प्रमाण पत्र के सहारे चुनाव लड़ा और जीता. बीते दिनों अर्जुन मुंडा द्वारा तमड़िया जनजाति को अनुसूचित जाति की श्रेणी में शामिल करने का बिल राज्यसभा में पेश हुआ है. कई संगठनों, नेताओं और सामाजिक क्षेत्र जुड़े लोगों ने इसका विरोध जताया है. उनका आरोप है कि अर्जुन मुंडा ने अपने फायदे के लिए तमड़िया जनजाति को एसटी में शामिल करवाया है. क्योंकि अर्जुन मुंडा तमड़िया जाति से आते हैं.

ऐसे में गंभीर सवाल भी उठाया खड़ा हुआ कि अगर तमड़िया एसटी सूची में शामिल नहीं है तो फिर अर्जुन मुंडा ने किस आधार पर खरसावां, एसटी रिजर्व सीट से और फिर खूंटी एसटी रिजर्व लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और विधायक और सांसद बने. साफ जाहिर होता है कि अर्जुन मुंडा ने गलत जाति प्रमाण पत्र के आधार पर चुनाव लड़ा है, और उनकी जाति प्रमाण पत्र की जांच होनी चाहिए. 2014 में पूर्व सांसद बागुन सुंब्रई ने भी कहा था कि अर्जुन मुंडा गलत ढंग से जाति प्रमाण पत्रके सहारे अनुसूचित जनजाति का लाभ ले रहे हैं.

फर्जी जाति प्रमाणपत्र के आधार चुनाव जीते गिरिडीह मेयर की सदस्यता हो चुकी है खत्म

ज्ञात हो, गिरिडीह के भजपा मेयर सुनील कुमार पासवान को भी बीते वर्ष फर्जी जाति प्रमाणपत्र पेश करने का दोषी पाया गया और उन्हें अयोग्य घोषित किया गया. नगर विकास विभाग ने सीधी कार्रवाई करते हुए उन्हें बर्खास्त किया. अनुसूचित जाति के फर्जी प्रमाण पत्र पर चुनाव लड़ने के दोषी पाए जाने पर उनपर कार्रवाई हुई. ज्ञात हो, अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित गिरिडीह नगर निगम के मेयर पद पर सुनील कुमार पासवान का चयन वर्ष 2018 में हुआ था. जेएमएम कार्यकर्ता ने उनके जाति प्रमाण पत्र को संदिग्ध बताते हुए जांच की मांग की थी. जांच में गिरिडीह डीसी ने जाति प्रमाण पत्र को गलत बताते हुए रद्द कर दिया. ऐसे में उस क्षेत्र में एससी रिजर्वेशन का अर्थ ही निरर्थक हो गया.

कांके विधायक समरी लाल पर फर्जी जाति प्रमाण पर चुनाव लड़ने का आरोप, मामला अब राज्यपाल के के पास  

भाजपा कांके विधायक समरी लाल पर भी फर्जी जाति प्रमाणपत्र के आधार पर चुनाव लड़ने का आरोप है. उनपर आरोप है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय के आदेश का उल्लंघन कर झारखण्ड में उन्हें अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र दिया गया है. वे मूलतः: राजस्थान के निवासी है. बीते दिनों जेएमएम व कांग्रस नेताओं ने राज्यपाल से मिलकर उनके फर्जी जाति प्रमाण को आधार बताते हुए उनके पद मुक्त करने की मांग की है. मामले में अब अंतिम निर्णय राज्यपाल को लेना है. 

बड़े नेता तो छोड़िए, भाजपा के वार्ड पार्षद स्तरीय नेता भी गलत जानकारी देकर बने जनप्रतिनिधि, हुए पदमुक्त

भाजपा के शीर्ष नेताओं के अलावा निचले स्तर के नेता भी गलत जानकारी परोस जनप्रतिनिधि बनने में पीछे नहीं रहे हैं. रांची के वार्ड-39 के पार्षद वेद प्रकाश सिंह को अयोग्य पाते हुए बीते दिनों ही कार्यमुक्त कर दिया गया है. चुनावी घोषणापत्र में आपराधिक मामलों, संपत्ति की गलत जानकारी वेद प्रकाश सिंह ने दी थी. शिकायतकर्ता द्वारा कहा गया था कि साल 2018 के निर्वाचन के समय गलत शपथ पत्र के आधार पर वेद प्रकाश सिंह निर्वाचित हुए थे. इन्होंने अपनी चल-अचल सम्पत्ति, कोर्ट में लंबित अपराधिक वाद के संबंध में गलत शपथ पत्र पेश किया था. शिकायत मिलने के बाद नगर विकास द्वारा हुआ, जांच में उन्हें दोषी पाया गया और उन्हें पदमुक्त किया गया.

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