ढहती अर्थव्यवस्था

ढहती अर्थव्यवस्था व बढ़ती बेरोज़गारी का जिम्मेदार केवल भाजपा

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पिछले 6 वर्षों में भाजपा की मोदी सत्ता तकरीबन 12 करोड़ रोजगार छिन चुकी है। साथ ही देश की अर्थव्यवस्था को अपनी गलत नीतियों से जिस प्रकार ढहाया है, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि भविष्य में बढ़ती बेरोज़गारी के हालात और भयंकर होने वाली है। अर्थव्यवस्था का सिकुड़न 2018 से जारी था।  और मोदी सरकार ने अपनी नाकामयाबी का ठीकरा एक्ट ऑफ़ गॉड बोल कोरोना संकट पर फोड़ दिया है। 

सच तो यह है कि देश में पहले ही नोटबंदी के कारण चार करोड़ नौकरियाँ जा चुकी थी। कोरोना महामारी देश में दस्तक दे रहा था और गृह मंत्री सरकार बनाने में व्यस्त थे। सरकार बनाने के बाद बचे अल्प समय में मोदी सरकार ने राज्यों से बिना सलाह-मशवरा किये, बेप्लानिंग लॉकडाउन का निर्णय आनन-फ़ानन में लिया। जिससे करोड़ों नौकरियाँ और ख़त्म हो गयी। आज देश में बेरोजगारों की संख्या 30 करोड़ पार कर चुकी है।

देश के सकल घरेलू उत्‍पाद (जीडीपी) में 2020 के वित्‍तीय वर्ष की पहली तिमाही, अप्रैल-जून में 23.9 फ़ीसदी की गिरावट आयी। यानी 2019 के वित्‍तीय वर्ष की पहली तिमाही के मुक़ाबले 2020 के वित्‍तीय वर्ष की पहली तिमाही में सकल घरेलू उत्‍पाद में 23.9 प्रतिशत की कमी आयी। लेकिन अगर इससे ठीक पहले की तिमाही से तुलना करें तो सकल घरेलू उत्‍पाद 29.5 प्रतिशत कम हो गया। 

गिरती अर्थव्यवस्था ने कुपोषण, भुखमरी और आत्महत्या जैसे हालात को जन्म दिया है

सकल घरेलू उत्‍पाद का मतलब होता है, किसी निश्चित समय में किसी देश में सभी वस्‍तुओं और सेवाओं का कुल मूल्‍य, जिसे कि मुद्रा में मापा जाता है। ज्ञात रहे, कुल सेवाओं में वित्‍तीय व बैंकिंग सेवाएँ भी शामिल हैं, जोकि इस पूरे संकट के दौरान बढ़ी है। अगर हम बैंकिंग व वित्‍तीय क्षेत्र की सेवाओं को निकाल दें, तो मालूम होगा कि जीडीपी में कहीं ज़्यादा भयंकर गिरावट आयी है। जो बढ़ती बेरोज़गारी के साथ कुपोषण, भुखमरी और आत्महत्या जैसे हालात को जन्म दिया है।

अर्थव्‍यवस्‍था के अलग-अलग सेक्‍टरों को देखें तो निर्माण उद्योग में 50 प्रतिशत की गिरावट आयी है। मैन्‍युफै़क्‍चरिंग यानी मोटे तौर पर औद्योगिक उत्‍पादन में 39 प्रतिशत की गिरावट आयी है। खनन उद्योग में 40 प्रतिशत, टेक्‍सटाइल में 30 प्रतिशत और ऑटोमोबाइल उद्योग में 19 प्रतिशत की गिरावट आयी है। नतीजतन, कुल निवेश में 47 प्रतिशत की कमी आयी है।

इसी दौर में कपड़ा उद्योग में मज़दूरी पर होने वाला ख़र्च 29 प्रतिशत कम हो गया, चमड़ा उद्योग में 22 प्रतिशत, ऑटोमोबाइल उद्योग में 19 प्रतिशत, पर्यटन उद्योग में 30 प्रतिशत, होटल उद्योग में 21 प्रतिशत की कमी आयी है। इसका नतीजा हमें करोड़ों नौकरियों के जाने के रूप में बढ़ती बेरोज़गारी देखने को मिला है। जो आबादी नौकरी खोने की त्रासदी से बच गयी, उसे अब पहले से भी कम मज़दूरी पर 12-12 घंटे काम करना पड़ रहा है।

मोदी सत्ता ने चंद पूँजीपतियों को दी लूट की खुली छूट 

दरअसल, दुनिया की तरह देश में भी पूँजीवादी व्यवस्था भीषण संकट से जूझ रहा है। जिसका स्थायी इलाज सरकार के पास न होने के कारण मोदी सत्ता ने चंद पूँजीपतियों को लूट की खुली छूट दे दी। जिससे अर्थव्यवस्था की हालत खस्ता होती गयी। फिर नोटबंदी व जीएसटी ने देश की आर्थिक गति ही रोक दी। और रही सही कसर बेप्लानिंग लॉकडाउन ने पूरी कर दी। 

2019 में देश में जब पिछले 45 वर्ष में सबसे ज़्यादा बेरोज़गारी के आंकड़े सामने आये तो सरकार ने बढ़ती बेरोज़गारी के आँकड़े देना ही बन्द कर दिया। लेकिन सीएमआईई ने पहले ही बता दिया था कि 2014 से 2019 के बीच क़रीब 5 करोड़ लोगों बेरोजगार हो जायेंगे। अब हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि मामला इस सरकार के हाथों से निकल चुका है।

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, केन्द्र सरकार के जॉब पोर्टल पर जुलाई-अगस्त के 40 दिनों में 69 लाख बेरोज़गारों ने रजिस्टर किया जिसमें मात्र 7700 को काम मिला यानी 0.1%, यानी 1000 में सिर्फ़ 1 आदमी को। जबकि केवल 14 से 21 अगस्त के बीच 1 सप्ताह में 7 लाख लोगों ने रजिस्टर किया है। सीएमआईई की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार मार्च से जुलाई के बीच देश में 1.9 करोड़ वेतनभोगियों की नौकरी चली गयी। और जुलाई 2020 में 50 लाख नौकरियाँ गयीं, यही अनुमान अगस्त माह की भी है। 

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि बढ़ती बेरोज़गारी के हालात अभी और बुरे होंगे

मसलन, जब अर्थशास्त्रियों ने कहा कि हालात अभी और बुरे होंगे। बेरोज़गारी दर 9.1% पहुँच गयी है। यह अभूतपूर्व है। तो सरकार की ओर से यह भ्रम फैलाया जाने लगा कि बेरोज़गारी का संकट महामारी की वजह से है और ऐसा पूरी दुनिया में हो रहा है। जबकि सीएमआईई के अनुसार सच यह है कि वेतन वाली नौकरियाँ लम्बे समय से बढ़ी ही नहीं हैं। 2019-20 में ऐसी नौकरियाँ 8.6 करोड़ थीं जो लॉकडाउन के बाद 21% कम होकर अप्रैल 2020 में 6.8 करोड़ रह गयीं और जुलाई के अंत तक 6.72 करोड़ रह गयी हैं।

मोदी सत्ता द्वाराख़ाली पड़े पद न भरा जाना और मौजूद नौकरियों को भी ख़त्म करना निजीकरण का एक प्रत्यक्ष साजिश का हिस्सा हो सकता है । सरकारी उपक्रमों की हालत जान कर ख़राब किया गया है। भारतीय रेल के कर्मचारियों की संख्या18 लाख से घटकर क़रीब 9 लाख हो जाना। 500 ट्रेनों व 10,000 स्टेशनों को बन्द करने की घोषणा कर दी है। ट्रेनों और स्टेशनों का निजीकरण पहले ही शुरू हो चुका है। और रोडवेज़ के वर्कशॉपों को भी प्राइवेट करने की तैयारी चल रही है। 

बैंकों की वैकेंसी पहले ही कम हो गयी थीं, अब कई बैंकों को आपस में मिला दिए जाने से नौकरियों में और भी कमी आने वाली है। बचे हुए सरकारी स्कूल बंद किये जा रहे हैं। सरकारी अस्पतालों की हालत ख़राब कर दी गयी है। कई परीक्षाएँ तो सात-सात साल से अधर में लटकी हैं। सरकार अपने सभी विभागों में नौकरियाँ ख़त्म कर चुकी है। इन ख़ाली जगह पर युवाओं को मौक़ा देने के बजाय तमाम नौकरियों को धीरे-धीरे कोरोना की आड़ में कम करना यही तो दर्शाता है।

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