बाल श्रम

बाल श्रम कलंक है समाज के लिए : हेमंत सोरेन

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जीवन में बचपन एक बहुत ही खूबसूरत यात्रा है। बचपन चिंताओं से परे आरामदायक व् आनंद भरी जीवन कहानी होती है। लेकिन,  कुछ बच्चों की लाचारी और मुफ्लसी न केवल उनके बचपन को आनंद से महरूम करती है, बल्कि उन्हें बाल श्रम दलदल में भी धकेल देती है। निस्संदेह वर्तमान में बाल श्रम बच्चों की मासूमियत के बीच एक अभिशाप है।

जहां 14 साल से कम उम्र के बच्चों से मजदूरी कराये जाने के लिए पूरी दुनिया में आवाजें उठती रही है। वहां श्रमिकों के पैरोकार, झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का कहना कि बाल श्रम कलंक है समाज के लिए – यह राहत देता है।

उनका यह भी कहना है कि बच्चों के जिज्ञासु दिमाग में देश के निर्माण की अपार संभावनाएं मौजूद होती हैं। उनके हंसते और खेलते बचपन में, पेन-पेंसिल, किताब-कॉपी, फुटबॉल और हॉकी जैसी चीजें की हाथों में दिखनी चाहिए। इसके लिए हमें युद्ध स्तर पर मिलकर काम करना होगा।

बाल श्रम बच्चों के विकास में सबसे बड़ी बाधा है। बाल मजदूरी से बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास अवरुद्ध होता है। बाल मज़दूरों का नाबालिक होने के कारण, उनके मालिक उनका अधिक शोषण करने में सक्षम होता है। और कम मज़दूरी में अधिक और किसी भी तरह का काम करने के लिए आसानी से राजी हो जाता है। जिसके बाद उनका बचपन आपराधिक गतिविधियों में बदल जाता है।

बच्चों में शिक्षा की कमी रहती है बाल श्रम से

बाल श्रम के कारण बच्चों के जीवन में न केवल शिक्षा की कमी हमेशा बनी रहती है। बल्कि, कारख़ानों, कोयला खानों, पटाखों की फ़ैक्टरी आदि में काम करने से उनकी जान को भी खतरा रहता है। गरीबी, अशिक्षित समाज और सरकार की निरंकुश नीतियों को बाल श्रम का मुख्य जिम्मेदार माना जा सकता है।

वास्तव में, वैश्वीकरण की गति ने कई हिस्सों में माल के उत्पादन की पूरी प्रक्रिया को तोड़ कर छोटी औद्योगिक इकाइयों या कारख़ानों में बिखेर दिया है। क्योंकि, वहां न तो कोई श्रम कानून लागू होता है और न ही कोई सामाजिक सुविधा। सबसे सस्ती श्रम खरीदने के लिए सबसे कुशल जगह! वह बाजार जिसमें बच्चों के श्रम के लिए सबसे कम बोली लगती है।

मसलन, बाल श्रम निषेध दिवस के अवसर पर झारखंड के मुख्यमंत्री का बचपन बचाने का प्रण लेना और क़ानून को सशक्त करने कि बात करना, निस्संदेह झारखंड के लिए अच्छी खबर हो सकती है।

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