बीजेपी शासन में पुलिस प्रशासन की मौजूदगी में बर्बरता क्यों? असम में दिखी क्रूरता की पराकाष्ठा

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पुलिस प्रशासन की मौजूदगी के बीच दिखी बर्बरता की पराकाष्ठा

भाजपा शासन में नागरिकों या आंदोलकारियों पर पुलिस द्वारा सर्वप्रथम हवाई फायरिंग, लाठीचार्ज, आंसूगैस जैसे विकल्पों के प्रयोग के बजाय गोली चलाने का चलन क्यों? पुलिस प्रशासन की मौजूदगी में बर्बरता की पराकाष्ठा क्यों?

रांची : भारत के भाजपा शासित राज्य असम से आई है या खौफनाक खबर. वायरल वीडियो न सिर्फ विचलित करने वाली है बल्कि इंसानियत के मद्देनजर उस भाजपा सत्ता प्रणाली पर सवाल उठानेवाली है. जो पूर्वी क्षेत्र पहुँचते ही अपने स्वयं सेवक के प्रचारकों की हत्या गिनवाने लगती है.  सबसे पहले इंसानियत और सत्ता के नाक तले हुई बर्बर घटना के बारे में मीडिया मे आई खबर को जान लें-

पुलिस के फोटोग्राफर ने की बर्बरियत

असम के दरांग जिले के धौलपुर गांव में पुलिस की मौजूदगी में अतिक्रमण हटाने का कार्यक्रम चल रहा था. इस दौरान अतिक्रमणकारियों और पुलिस के बीच झडप हो गई. अतिक्रमणकारियों के पथराव के जवाब में पुलिस ने सरकारी गोलियां चलाई. एक व्यक्ति घायल होकर जमीन पर गिर पड़ा. इसके बाद पुलिस के साथ मौजूद फोटोग्राफर ने जो कुकर्म किया, वह न केवल लोकतंत्र की आत्मा को छलनी करती है, समाजिक इंसानियत के मायने को भी शर्मिंदा करती है. जिसे बर्बरता जैसे शब्द भी पूर्ण नहीं उभार सकती. 

साभार : Oneindia English (कृपया कमजोर दिलवाले या बच्चे न देखें)

गोली से घायल व्यक्ति के शरीर पर कूदना, यह कैसी नफरत

तस्वीर- गोली से घायल व्यक्ति ज़मीन पर औंधे पड़ा है. बिजय शंकर बनिया नाम का यह फोटोग्राफर उसके शरीर के ऊपर कूदता हुआ दिखाई देता है. इतना ही नहीं वह पत्थर जैसे किसी चीज से उस अधमरे व्यति पर निर्ममता से प्रहार भी करता दिख रहा है. पुलिस का एक जवान भी उस गिरे हुए अधमरे व्यक्ति के शरीर पर लाठी मारता दिखाई दे रहा है. जिससे उस घायल व्यक्ति की मौत हो गई. एक और व्यक्ति के मरने की खबर है. 

हालांकि, पथराव में कुछ पुलिसवालों की भी घायल होने की सूचना है, जिसमें एक-दो की हालत गंभीर बताई जा रही है. आगे की खबर यह है कि फोटोग्राफर को गिरफ्तार कर लिया गया है. मामले की गंभीरता को देखते हुए असम सरकार ने घटना की न्यायिक जांच के आदेश दे दिए हैं. 

भाजपा शासन में नागरिकों या आंदोलकारियों पर पुलिस द्वारा सर्वप्रथम हवाई फायरिंग, लाठीचार्ज, आंसूगैस जैसे विकल्पों के प्रयोग के बजाय गोली चलाने का चलन क्यों?

बहरहाल, हो सकता है वह अतिक्रमणकारी गलत हो. पुलिस पर पथराव किसी भी दृष्टि से जायज नहीं माना जा सकता. लेकिन, पुलिस सर्वप्रथम नागरिकों पर गोली चलाने के बजाय़ हवाई फायरिंग भी कर सकती थी, लाठीचार्ज कर सकती थी, आंसूगैस के गोले छोड़ सकती थी. तमाम विकल्पों के बजाय पुलिस की मौजूदगी में गोली से घायल व्यक्ति पर ऐसी बर्बरतापूर्ण हमला किया जाना दर्शाता है कि इस पुलिस कार्रवाई में राज्य सरकार की सहमति हो सकती.

एक लोकतांत्रिक देश में इस तरह की घटनाएं शुभ संकेत नहीं है. भाजपा शासित राज्य़ों में शासन के द्वारा आम लोगों पर हमले कोई नई बात नहीं है. यहीं वजह है कि भाजपा के प्रति जनता का आक्रोश बढ़ता जा रहा है. अभी तक भाजपा के किसी भी नेता ने इस घटना की निंदा नहीं की है. जबकि गैरभाजपा शासित राज्यों में छोटी-छोटी घटनाओं पर भाजपाई अखबारों, टीवी व सोशल मीडिया पर सक्रिय हो मजबूत विपक्ष होने का ढोल पीटने लगते हैं.

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