आगामी चुनाव, सुप्रीम कोर्ट की दखल और राज्य व जनता में भारी विरोध – बीजेपी का निःशुल्क वैक्सीनेशन निर्णय डैमेज कंट्रोल की अंतिम आस

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बीजेपी का निःशुल्क वैक्सीनेशन
  • बिहार विधानसभा चुनाव में भी कोरोना वैक्सीन ही था भाजपा मुख्य मुद्दा -आपदा को अवसर में बदलने में बीजेपी नेता हमेशा रहे हैं आतुर
  • उत्तर प्रदेश के योगी युग में बैनरों से गायब मोदी-शाह की तस्वीर, मोदी युग की गिरती साख की कहानी करती है बयान.

वैक्सीन को कमाई का साधन मानने वाली केन्द्रीय नीति, जिसे सुप्रीम कोर्ट तक बता चुकी है ‘मनमाना व अतार्किक’, का कोर कमिटी की बैठक के ठीक अगली शाम को अचानक यूटर्न लेना, दर्शाता है कि प्रधानमंत्री का निःशुल्क वैक्सीनेशन का एलान, सामाजिक से अधिक राजनीति से है प्रेरित 

रांची: कोरोना महामारी ने आज देश को त्रासदी के उस विकट स्थिति में ला खड़ा किया है. जहाँ महामारी में जीवन से लेकर जीविका तक के लिए विपरीत परिस्थिति उत्पन्न हो चली है. तो वहीं लचर आर्थिक नीति के अक्स में, देश की गिरती अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने का सामर्थ्य, मौजूदा कॉर्पोरेट प्रेमी मोदी सत्ता में दूर-दूर तक नहीं दिखता. और तमाम परिस्थितियों के बीच राज्यों की सरकार मिलकर महामारी से लड़ना भी चाहती है. तो केन्द्रीय मोदी सरकार का आपदा में अवसर तलाशने की मानसिकता, उनके तमाम रणनीति के आड़े आ खड़ा होती है.

भाजपा के लिए आपदा को अवसर में बदलने की हकीकत कोई नई नहीं 

ज्ञात हो, बिहार विधानसभा के चुनावी दौर में, भाजपा का मुख्य मुद्दा, मुफ्त कोरोना वैक्सीन ही रहा था. जबकि उस वक़्त तक वैक्सीन की खोज हुई भी नहीं थी. लेकिन भाजपा ने वैक्सीन को जरिया बना कर चुनाव जीते. जाहिर है इस मानसिकता को आपदा में अवसर तलाशना ही कहा जा सकता है. यही वादे पांच राज्यों में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव प्रचार में दोहराए गए. और अब एक बाऱ फिर देश में पांच राज्यों के चुनाव होने हैं. तो केंद्र सरकार ने निःशुल्क वैक्सीनेशन की घोषणा कर, राजनीति के चौसर पर चुनावी पासे फेंक, दाव चलने से नहीं चुकी है. ज्ञात हो, भाजपा का एक धड़ा का काम ही केवल यही रहता है कि कैसे आपदा में अवसर तलाशा जाए.

हालांकि, चुनावी कारण ही सही फिर भी केंद्र के मुफ्त वैक्सीनेशन निर्णय का स्वागत किया जाना चाहिए. क्योकि इस निर्णय में देश का जीवन निहित है. लेकिन, चूँकि भाजपा के लिए मुफ्त वैक्सीनेशन महज एक चुनावी स्टंट भर है. ऐसे में, देश के दयनीय हालात के मद्देनजर, निःशुल्क वैक्सीनेशन निर्णय की समीक्षा से मुंह मोड़ा नहीं जाना चाहिए. मसलन, अगले साल की शुरुआत में, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा व गुजरात में होने वाले विधानसभा चुनावों में, राजनीतिक दृष्टिकोण से निशुल्क वैक्सीनेशन के प्रभावों का आकलन महत्वपूर्ण हो जाता है. 

कोर कमिटी बैठक के महज 24 घंटे मे बीजेपी की निःशुल्क वैक्सीनेशन का घोषणा के पीछे, छिपे है कई राजनीतिक अर्थ

ज्ञात हो, राज्यों को निःशुल्क वैक्सीन मुहैय्या कराने की घोषणा, प्रधानमंत्री ने मंगलवार शाम को किया था. लेकिन, ठीक 24 घंटे पहले, सोमवार शाम, मोदी जी के अगुवाई में पार्टी कोर-कमिटी की बैठक संपन्न हुई थी. सूत्रों की मानें तो, भाजपा ने उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड समेत पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू कर दी है. चर्चा आम हो चली है कि विधानसभा चुनाव के मद्देनजर बीजेपी ने सभी फ्रंटलाइन संगठनों को सक्रिय कर दिया है. साथ ही उन तमाम मामलों में छवि बेहतर करने के प्रयास भी शुरू कर दिए गए हैं, जिसमे उन्हें बदनामी झेलनी पड़ी रही है. जिसमे कोरोना वैक्सीन की द्वेष नीति प्रमुखता से शामिल हैं. 

केंद्र की निःशुल्क वैक्सीनेशन के फैसले के पीछे कोर्ट की आलोचना से अधिक मोदी का टूटता झूठा तिलिस्म जिम्मेवार 

मोदी सत्ता के कार्यप्रणाली को देखते हुए यह प्रतीत नहीं होता कि पीएम का निःशुल्क वैक्सीनेशन का निर्णय, केवल सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की आलोचना से प्रेरित है. हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र के वैक्सीकनेशन पॉलिसी को मनमाना और अतार्किक’ बताते हुए, सवाल उठाये थे, टीके की अलग-अलग कीमतों पर भी तल्ख सवाल जरुर पूछे थे. लेकिन, चूँकि यह देखा जाता रहा है कि मोदी सरकार जब भी फंसती है सुप्रीम कोर्ट ने उसके लिए ढाल बनने का काम किया है. 

मसलन, राज्यों व जनता के भारी विरोध के बीच, बीजेपी के लिए बड़ा प्रश्न यही हो चला था कि वह आगामी चुनाव में काले चेहरे के साथ चुनावी मैदान में कैसे उतरेगा. और अगले बरस होने वाले राज्य चुनाव में, अधिकाँश जगह उनकी ही सत्ता है. और यूपी के हालत सांप-छछूंदर वाली भी हो चली है. ऐसे में यदि भाजपा चुनाव हारती है मोदी के लिए प्रधानमंत्री का सफ़र नामुमकिन हो जाएगा. मसलन, केंद्र का निःशुल्क टीकाकरण का निर्णय ही उसके सवास्थ्य के लिए बेहतर निर्णय हो सकता था. ऐसे में, मोदी जी द्वारा आनन-फानन में लिया गया फैसला सामाजिक से अधिक राजनीतिक ही हो सकता है. 

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