बीजेपी का बाहरी व विभीषणों के मदद से जन नेताओं को अयोग्य करार देने, परेशान करने का खेल

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झारखण्ड : चुनावी हलफनामा में जिक्र होने के बावजूद खान लीज मामले को भाजपा द्वारा बाबूलाल जी के कंधे से उछाला गया. सीएम को अयोग्य घोषित करने का प्रयास हुआ. नाकामयाबी के बाद भाजपा शासन में हुए घोटाले को ईडी के मध्यम से उजागर कर हेमन्त सरकार के मत्थे मढ़ने का प्रयास जारी.  

राँची : झारखण्ड में मौजूदा दौर में, सीएम हेमन्त सोरेन का स्पष्ट अर्थ आदिवासी-दलित समेत सभी वर्गों के मूलवासियों का अधिकार संरक्षण है. झारखण्ड जैसे प्राकृतिक संसाधन बाहुल्य, लेकिन गरीब राज्य का भविष्य निर्माता भी है. हेमन्त सोरेन जैसे झारखंडी मानसिकता का अर्थ झारखण्ड के 21 वर्षों के राजनीतिक इतिहास में भाजपा सत्ता की ठाठ से समझा जा सकता है. बतौर मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन भाजपा जैसे कॉर्पोरेट दल के नीतियों के राहों में मजबूत दीवार बन कर उभरे है. मसलन, हेमन्त सोरेन को झारखण्ड की राजनीति से पृथक करना भाजपा का पहला- अंतिम लक्ष्य बन गया है.

भाजपा यह प्रयोग बिहार, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, बंगाल जैसे राज्यों में पहले ही कर चुकी है. जिसमे वह बिहार-उत्तर प्रदेश में सफल भी हुई है. ज्ञात हो, भाजपा-संघ ने बड़ी चतुराई से बिहार-उतारप्रदेश में यादव समुदाय को अन्य समुदायों से पृथक कर दिया है. बंगाल-महाराष्ट्र-झारखण्ड जैसे राज्य में वह सफल नहीं हो पायी है, लेकिन प्रयास निरंतर जारी है. ऐसे प्रयास में भाजपा मुख्यता दो खेल रचती दिखी है. पहला वह राज्यों में बाहरियों व विभीषणों के मिली भगत से फूट डालती हैं, फिर वहां के स्थापित जन नेताओं को अयोग्य करार देने, सीबीआई-ईडी जैसे संस्थाओं के माध्यम से परेशान करने का खेल खेलती है.

चुनावी हलफनामा में जिक्र होने के बावजूद खान लीज मामले को भाजपा द्वारा बाबूलाल मरांडी के कंधे से उछाला गया

मौजूदा दौर में, भाजपा का यह खेल झारखण्ड में स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है. जहाँ सीएम हेमन्त सोरेन द्वारा पहले ही चुनावी हलफनामा में खान लीज का जिक्र करने के बावजूद, मामला ऑफ गुड्स बिजनेस न होने के बावजूद, मामले को बाबूलाल मरांडी के कंधे से उछाला गया. मुख्यमंत्री को अयोग्य घोषित करने का प्रयास हुआ. मंशा में मिली असफलता के बाद वह रुके नहीं, भाजपा शासन में हुए घोटाले को ईडी जैसे संस्थान के मध्यम से उजागर करने की कवायद जारी है. और रघुवर सरकार के घोटाले को हेमन्त सरकार के मत्थे मढ़ने का काला खेल जारी है.

ज्ञात हो, हेमन्त सरकार झारखण्ड जैसे गरीब राज्य में नौकरी, स्थानीयता, शिक्षा, पर्यटन, कृषि, स्वरोजगार, उद्योगिकीकरण, महिला सशक्तिकरण, आदिवासी-दलित-ओबीसी अधिकार जैसे मूल समस्याओं के स्थाई हल की दिशा में मजबूती के बढ़ चली थी. लेकिन, भाजपा ने अपने काले खेल से तमाम गतिविधियों को धीमा का दिया है. जो झारखण्ड के अर्तव्यवस्था-भविष्य के लिए घातक साबित होंगे. मसलन, झारखण्ड को ऐसे महीन झारखण्ड विरोधी राजनीति को समझना ही होगा. यदि समय रहते राज्य नहीं समझ पाया, तो राज्य विकास और स्वावलंबी भविष्य की ओर ढाई पग भी नहीं बढ़ पाएगा.

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