भारत पर्यटन विकास निगम और झारखंड सरकार के बीच एमओयू

भारत पर्यटन विकास निगम और झारखंड सरकार के बीच एमओयू हस्ताक्षर

Share on facebook
Share on twitter
Share on linkedin
Share on telegram
Share on whatsapp

हेमंत सरकार झारखंड के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, प्राकृतिक, खनन, आदिवासियत, जनजातीय विरासत को समझने के लिए पर्यटन के रूप में अनोखा रास्ता खोलने को तैयार है। आज भारत पर्यटन विकास निगम और राज्य सरकार के बीच शेयर होल्डर्स के हस्‍तांरण से संबंधित एमओयू हस्ताक्षर हुआ। झारखंड में पर्यटन की असीम संभावना है आखिरकार, 20 वर्षों के बाद किसी झारखंडी सरकार को समझ आया है। निस्संदेह यह हेमन्त सरकार के लिए एक उपलब्धि हो सकती है। सरकार का यह कदम नके इस क्षेत्र में रोज़गार सृजन कर यहाँ के लोगों को आर्थिक रूप से मजबूत करेगा, बल्कि राज्य के महान संस्कृति का विस्तार करते हुए देश-दुनिया को अवगत भी कराएगी।

झारखंड का प्राकृतिक सौन्दर्य पर्यटकों कर सकता है निःशब्द

झारखंड राज्य न केवल भारत देश का खनिज-सम्पदा बाहुल्य क्षेत्र है, ऐतिहासिक विरासत को सहेजे खूबसूरत वन भूमि का प्रदेश भी है जो पारिस्थितिकी पर्यटकों को अवकाश का आनंद लेने के लिए प्राकृतिक रूप में आकर्षित भी करता है। प्राकृतिक सौंदर्य से धनी झारखंड विविध वनस्पति और घने जंगलों, खूबसूरत झरने, सुंदर पहाड़ियों, परंपरा से सराबोर आदिवासी, खनन क्षेत्र, प्रसिद्ध राष्ट्रीय पार्क और आंखों को शीतल प्रदान करने वाले कई दर्शनीय स्थल सहेजे है। 

बेतला राष्ट्रीय उद्यान : यह उद्यान अपने नाम को सार्थक करते हुए 753 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। यह वन अपनी बाँहें केच्की से लेकर नेतरहाट तक फैलाई हुई है। इस वन में 970 प्रजाति के पौधे, 174 प्रजातियों के पक्षी, 39 स्तनधारी, 180 प्रजाति के औषधीय पौधे पाए जाते हैं।

सारंडा : विकराल साल वन, एशिया का सबसे बड़ा और घना वन है जिसमे कुछ हिस्से ऐसे हैं जहाँ सूर्य के प्रकाश भी सेंध नहीं लगा पाती। कई ऐतिहासिक पूजा स्थल, लगभग 700 पहाड़ों का घर, फ्लाइंग छिपकली, रेंगनेवाले कीड़ों के प्रजाति का घर भी है। यह वन साहसिक पारिस्थितिकी उत्साही यात्रियों को खुला आमंत्रण देती है।

तिलैया डैम : हजारीबाग जिले में दामोदर घाटी निगम द्वारा यहाँ पन बिजली पावर स्टेशन का निर्माण, बराकर नदी पर किया गया है। यह 1200 फुट लंबा और 99 फुट ऊँचा है और 36 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में एक आदर्श जलाशय के समीप स्थित है। यह डैम के माधाम से न केवल 4.000 किलो वाट बिजली का उत्पादन होता है बल्कि आसपास के क्षेत्र को बाढ़ से भी बचाता है। आसपास का खूबसूरत प्राकृतिक वातावरण पर्यटकों को खूब रास आता है। साथ ही कई कई आतुल्नीय फॉल भी इस प्रदेश में मौजूद है।

झारखंड खनन पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र

खान-खनिज, उद्योग और वन्यजीव विहार के लिए भी झारखंड देश भर में जाना माना नाम है। राज्य छोटानागपुर प्रमंडल खान, खनिज, खाद, वन्य जीव, स्टील उद्योग, जैनियों के तीर्थस्थल के रूप में भी प्रसिद्ध है। यह इलाका लोह अयस्क, इस्पात, कोयला व माइका से समृद्ध है। कई खदाने अपने पूर्वजों की याद व ऐतिहासिक अवशेष साक्ष के साथ प्रयात्कों को अपनी कहानी बयान करने के लिए  वर्षों से खड़े हैं। साथ ही कोयले के ग्रेड में एक विस्तृत विविधता भी अपने दामन में रखती है। 

झारखंड में हेरिटेज-पर्यटन

1562 में चेरों के राजा मेदनी राय द्वारा अपने पुत्र प्रताप राय के लिए निर्माण करवाया गया पलामू किला। जिसका ऐतिहासिक व आकर्षक पक्ष है किले का दरवाजा है। जो नागपुरी शैली में बना है। दरवाजे की ऊंचाई 40 फीट तथा चौडाई 15 फीट है। इस क्षेत्र के प्रसिद्ध कई लोकगीतों में इसकी विशालता व महत्ता का वर्णन पाया जाता है। पलामू किला से 2 किलोमीटर की दूरी पर कमलदह झील का किला है जो मेदनीराय की रानी का था। जिन्हें प्रकृति से बहुत प्यार था, लेकिन उनकी मौत  वहीँ स्थित तालाब में स्नान करने के क्रम में डूबने से हो गयी थी। चेरो जनजाति इसे आज भी इसे जादू मानते थे।

झारखण्ड में जनजातीय-पर्यटन

  • संथाल :  भारत के सबसे प्राचीनतम जनजातियों में से एक है। यह आदिवासी वर्ग उनके संगीत, नृत्य और रंगबिरंगे पोशाक के लिए जाना जाता है। झारखंड में जनजातीय पर्यटन की यात्रा संथाल के विभिन्न गांवों में और छोटानागपुर पठार में कर सकते हैं। आदिवासी समुदाय के मेलों और त्योहारों में भी आपको उनके सामाजिक जीवन की झलक मिलेगी |
  • असुर : सबसे प्राचीन जनजातीय समुदायों में से एक है, ये अपने सदियों पुरानी ” लोहे के प्रगालन ” कौशल के लिए जाने जाते हैं। पुरुष और महिलाएं साथ मिलकर काम करते है, साथ मिलकर खाते हैं, एक साथ वंश की देखभाल करते हैं और रोटी कमाने के लिए साथ में संघर्ष करते हुए रहते हैं। सामाजिक, आर्थिक एकता के साथ श्रम का अद्वितीय विभाजन भी इस समुदाय में देखने को मिलता है। 
  • मुंडा : एक अन्य ऑस्ट्रो-एशियाई जाति की आबादी के अनुसार झारखंड में तीसरा स्थान है। मुंडा महिलाएं आभूषण के बहुत शौकीन हैं।
  • बिरहोर : यह एक खानाबदोश जनजाति है जो उनके फायटोप्लेकटन क्षमताओं के लिए जाने जाते है। ये उच्च पहाड़ी चोटियों या जंगलों के बाहरी इलाके में वास करते हैं। जो अस्थायी झोपडियों में समूहों में वास करते हैं और लच्छीवाला परिवार के जीवन का आनंद ले रहे हैं। जगही बिरहोर के नाम से जाना जाता है और कलाइयों समूहों को ऊथेइअन बिरहोर कहा जाता है।
  • महली : बंसफोर महली टोकरी बनाने के विशेषज्ञ हैं और सुलुन्खी महली श्रम की खेती पर जीवित है। तांती महली पारंपरिक ‘पालकी’ के पदाधिकारी हैं और मुंडा महली किसान है। आमतौर पर महली वंश, जनजाति और कबीले के साथ उत्कृष्ट संबंध बनाए रखते हैं।
  • चिकबरैक : यह स्पिनर और बुनकरों के समुदाय के रूप में, चिकबरैक गांवों में अन्य जातियों और जनजातियों के साथ रहते हैं। परिवार मजबूत हैं और श्रम विभाजन उम्र के अनुसार किया जाता है।
  • बिरजिया और बैगास : छोटी अनुसूचित जनजातियाँ अभी भी वन संसाधनों पर निर्भर है। ये गहरे जंगल और दुर्गम कृषि क्षेत्रों में रहते हैं। हाल के दिनों में उन्होंने खेती को त्याग दिया है। बिगास की खोज 1867 में ‘जंगली’ के रूप में और दूरदराज के दुर्गम पहाड़ियों के वन क्षेत्रों में रहने वाले के रूप में हुई थी।
  • बंजारा : इस समूह की संख्या तेजी से घट रही है। उनके गाँव पहाड़ियों और जंगलों के निकट स्थित है। वे कुशल बुनकर होते हैं जो मैट, टोकरियाँ, ट्रे आदि जंगली घास से बनाते है और वे अकसर समूह में निवास करते है। वे बच्चे के जन्म पर गांवों के आसपास जाकर प्रार्थना के गाने भी गाते है।

झारखंड में धार्मिक पर्यटकों के लिए बहुत कुछ

  • देवघर का शाब्दिक अर्थ – “परमेश्वर का निवास”। श्रद्धालु सुल्तानगंज में उत्तर वाहिनी गंगा में डुबकी लगाने के बाद गंगा का पवित्र जल कांवर में लेकर, नंगे पांव 105 किलोमीटर की दूरी तय कर के देवघर जाते हैं। ऐसे कई धार्मिक महत्व के स्थल इस पवित्र शहर के आसपास है।
  • झारखण्ड का सबसे ऊँचा पठार, जिसकी ऊंचाई समुद्रतल से 4480 फीट है। यहाँ के मंदिर को जैनियों का सबसे पूज्य व पवित्र स्थान माना गया है। जैन मान्यता के अनुसार 24 तीर्थकरों में से 20 को मोक्ष की प्राप्ति यहीं हुई है। 
  • राजधानी रांची का पहाड़ी मंदिर, जो भगवान शिव को समर्पित है। लेकिन देश का एक मात्र मंदिर जहाँ स्वतंत्रता और गणतंत्र दिवस पर मंदिर के उपरी छोर पर राष्ट्रीय तिरंगा फहरा कर  स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान प्राणों का बलिदान देने वाले महापुरुषों को सम्मान देता है। देश के कई स्वतंत्रता सेनानियों को यहाँ फाँसी दी गयी है। 

रामगढ -बोकारो मार्ग पर माँ छिन्नमस्तिका का मंदिर स्थित है, जो देश भर में प्रसिद्ध है। मन्नत मांगने व पूरे होने पर पुनः दर्शन करने यहाँ भक्त काफी संख्या में पहुंचते हैं। इसी प्रकार जगन्नाथपुर मंदिर, सूर्य मंदिर, अंगराबाड़ी अदि कई धार्मिक स्थल अपने पहचान के साथ मौजूद है।

Share on facebook
Share on twitter
Share on linkedin
Share on telegram
Share on whatsapp

This Post Has One Comment

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.