बाबूलाल मरांडी का वैक्सीन पर बोला गया सफेद झूठ बनी क्षेत्रीय व राष्ट्रीय अखबारों की सुर्खियां

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बाबूलाल मरांडी का सफेद झूठ बनी अखबारों की सुर्खियां

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने किया बाबूलाल मरांडी के सफेद झूठ का किया पर्दाफाश. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की भी उड़ चुकी है धज्जियां

रांची : मौजूदा दौर में झारखंड की राजनीति में, बाबूलाल मरांडी जी का चर्चा पूर्व मुख्यमंत्री से अधिक दलबदलू नेता के रूप में है. भाजपा में जाने बाद उनके राजनीतिक जीवन के ग्राफ में भारी गिरावट देखने को मिला है. चूँकि उन्हें भाजपा की लूट विचारधारा के दबाव में, खुद की व्यक्तित्व से अलग बयान-बाजी करनी पड़ रही है. उनके बयानों के शब्द उनके मुख-मुद्रा से मेल नहीं खाते. और तमाम परिस्थितियों में उनका सफेद झूठ जनता के पकड़ में आसानी से आ जाते हैं. जो लगातार क्षेत्रीय ही नहीं राष्ट्रीय अखबार की भी सुर्खियां बटोर रही है.

केन्द्रीय वैक्सीन नीति में उनके महिमामंडन को झूठा साबित करती है उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी

कोरोना वैक्सीनेशन नीति पर बाबूलाल जी लगातार केंद्र का झूठा महिमामंडन करते रहे है. जबकि एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय ने केंद्र की वैक्सीनेशन नीति की आलोचना करते हुए उससे तीखे सवाल पूछे. और सत्य सामने आया. जो साफ तौर पर झारखंड में बाबूलाल जी के केद्र की महिमामंडन पर सवाल खड़े करते हैं और उन्हें झूठा भी साबित करता है. 

ज्ञात हो, न्यायालय के एक अहम फैसले में कहा गया कि केंद्र की वैक्सीन नीति पूरी तरह से “तर्कहीन और आधारहीन” है. न्यायालय के इस टिप्पणी को देशभर में बड़े मीडिया हाउस और क्षेत्रीय समाचार पत्रों में प्रमुखता के साथ जगह मिली. जो साबित करता है कि वैक्सीन को लेकर, बाबूलाल जी का अब तक के तमाम बयान एक सफेद झूठ है. 

राजनीतिक महत्वाकांक्षा की पूर्ति में बाबूलाल जी द्वारा बोला गया झूठ – उनके व्यक्तित्व व मुख-मुद्रा से मेल नहीं खाते

बाबूलाल जी द्वारा राजनीतिक महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए, भाजपा विचारधारा के आगे खुद की व्यक्तित्व का समर्पण कर दिया है. जो मौजूदा दौर में उनके राजनीतिक अस्तित्व पर ग्रहण बनकर उभरा है. और उनके लोकप्रियता में भारी गिरावट का कारण भी बना है. नतीजतन, वह अपने व्यक्तित्व के अनुरूप आज झूठ को झूठ और सत्य को सत्य बता पाने में खुद सक्षम नहीं पा रहे. यही वजह है कि वह झारखंड में कोरोना संक्रमण के बेहतर आंकड़ों की सच्चाई को मानते हुए भी, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पीठ तक नहीं थपथपा पाए. 

ज्ञात हो, बतौर जेवीएम अध्यक्ष बाबूलाल जी द्वारा बीजेपी की जनविरोधी नीतियों पर किया गया हमला, झारखंड अब तक नहीं भूला होगा. पर्दे में छुपे कई काले सच को उन्होंने बाहर लाया था, झारखंड यह भी नहीं भूला होगा. लेकिन, झारखंड को कहाँ पता था, जेवीएम का वह झारखंडी व्यक्तित्व, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की पूर्ति में लूट मानसिकता को अपनाने से नहीं चुकेगा. और बीजेपी विचारधारा के आगे उसकी मजबूत अभिव्यक्ति दम तोड़ देंगे. जहाँ मानसिक असंतुलन के मद्देनजर वह बयान देने से नहीं चुकेगा कि वैक्सीन की कीमत राज्य सरकार तय कर रही है. 

मसलन, झूठ तो आखिर झूठ होता है और चेहरा कभी झूठ का साथ नहीं निभाता. स्वयं उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी से सत्य सामने आया, जिसमे पता चला कि वैक्सीन की कीमत तो केंद्र और वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों द्वारा तय की जा रही है. 

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की गलत रिपोर्ट से बीजेपी नेताओं की उड़ चुकी है धज्जियां

बड़े बुजुग कह गए हैं कि नक़ल के लिए भी अकल चाहिए. मौजूदा दौर में झारखंड की भाजपा इकाई की स्थिति केंद्र के समक्ष यह हो चली है कि उन्हें झारखंड से सम्बंधित आंकड़ों के लिए भी केंद्र पर निर्भर रहना पड़ता है. और झारखंड को नीचा दिखाने के लिए, केंद्र जो भी लिख कर देता है, उसकी सच्चाई का बिन परख किये, राज्य की भाजपा इकाई तोते की बोल देती है. ज्ञात हो, कोरोना वैक्सीन की बर्बादी को लेकर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की झूठी रिपोर्ट को बाबूलाल मरांडी सरीखे नेता तक ने, बिना सच्चाई का मिलान किए पटल पर रखा. हालांकि, रिपोर्ट का खंडन मंत्रालय ने स्वयं कर अपनी विश्वसनीयता पर सवाल ज़रुर खड़े किये.

मसलन, बाबूलाल सरीखे नेता की स्थिति को देखते हुए समझा जा सकता है कि राज्य के भाजपा नेताओं की हैसियत केन्द्रीय आकाओं के समक्ष क्या हो सकती है. और झारखंडी बीजेपी नेता किस हद झूठ बोलने को विवश हैं. बाबूलाल मरांडी जी को झूठ ने उन्हें जनता के समक्ष मुंह दिखाने लायक भी नहीं छोड़ा है. जिसके अक्स में, सवाल प्रबल हो चले हैं कि लूटेरी मानसिकता में विलीन एक व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ग्रसित व्यक्तित्व कैसे झारखंड का भला चाह सकता है…? 

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