BJP आकर हेमंत सरकार की आलोचना से ज्यादा विकास की बात करते बाबूलाल, तो छवि कुछ और ही होती

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झारखंड से प्रेम दिखाने वाले का छलवा करते हैं बाबूलाल मरांडी, कभी भी किसी सरकार को नहीं दिखाया विकास का रास्ता, जनवरी 2020 से तो आलोचना करते ही दिखे पूर्व सीएम

रांची। वर्तमान में अगर झारखंड के वरिष्ठ नेता की बात करें, तो दो नाम जहन में जरूर से आता है। पहला जेएमएम सुप्रीमो दिशुम गुरू शिबु सोरेन और दूसरा नाम पूर्व सीएम बाबूलाल मरांडी का आता है। हमेशा अपने सिंद्धातों पर राजनीति करने वाले दिशुम गुरू अभी राज्य सभा सांसद है। उन्होंने हमेशा झारखंड के विकास के लिए राजनीति से परे हटकर किसी भी सरकार को विकास का मार्ग दिखाने का काम किया है। वहीं बिना सिंद्धात के राजनीति करने वाले पूर्व सीएम बाबूलाल मरांडी का चरित्र इससे बहुत उलटा है। जेवीएम नेता रहते बाबूलाल ने हमेशा भाजपा सरकारों विशेषकर रघुवर सरकार और भाजपा में आने के बाद हेमंत सरकार की आलोचना ही करते रहे हैं। अगर इससे उलट बाबूलाल विकास की बात करते, तो उनकी छवि कुछ और ही होती।


स्वघोषित तौर पर बीजेपी नेता बनने वाले बाबूलाल ने घमंड कर छोड़ा था गठबंधन का साथ


वर्तमान में एक विधायक और स्वघोषित तौर पर विपक्ष का नेता बन चुके बाबूलाल मरांडी ने शायद ही कभी झारखंड को विकास का रास्ता दिखाया है। झारखंडियों से प्रेम का दावा करने वाले बाबूलाल ने अपनी घमंड वाली सोच से सरकारों की आलोचना जरूर करते जरूर दिखे है। बाबूलाल की महत्वकांक्षा वाली राजनीति तो विधानसभा चुनाव-2019 में ही दिखी थी, जब घमंड वाली सोच के तहत उन्होंने हेमंत सरकार के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार में शामिल होने से इन्कार कर दिया था। दरअसल बाबूलाल कभी नहीं चाहते थे कि युवा नेता हेमंत सोरेन उनके रहते मुख्यमंत्री बने। गठबंधन का अंग नहीं बनकर बाबूलाल की सोच थी, तो अधिक विधानसभा सीटें जीतकर वे किंग मेकर की भूमिका में रहेंगे। लेकिन चुनाव में उनकी पार्टी जेवीएम को जनता ने नकार दिया।


जेवीएम में रहते पैसा नहीं कमाने की हताशा से बाबूलाल ने दोबारा थामा बीजेपी का दामन


अगर बाबूलाल मरांडी के पिछले 15 दिनों की राजनीति को देखे, तो उन्होंने केवल नकारात्मक बातें ही की है। कभी सरकार को पत्र लिखकर तो कभी मीडिया में बयानबाजी करके। पिछले दिनों जब मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन गठबंधन सरकार अंतर्गत राज्य का विकास की बात को लेकर दिल्ली दौरा पर गये थे, उसपर बाबूलाल का कहना है कि बिना प्रोग्राम के मुख्यमंत्री दिल्ली गए थे, तो इस दौरान उन्होंने जानकारी हासिल की थी। उन्हें पता चला कि कोयला से, बालू से, शराब से, आयरन से, पत्थर से जो भी पैसा एक-डेढ़ वर्षों में कमाया गया, उसका ठीक से हिस्सा वहां तक नहीं पहुंचा था, इसी के बंटवारे के सिलसिले में मुख्यमंत्री दिल्ली पहुंचे हुए थे। सवाल तो बाबूलाल से पूछना चाहिए कि क्या जेवीएम में रहते पैसा कमाने में वे असफल रहे, तो हताशा में उन्होंने बीजेपी में दोबारा जाने का मन बनाया था।

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