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पूँजीपतियों

बाबूलाल जी भाजपा में जाते ही भूल गए हैं, जनता उन्हें बताये क्यों हेमंत को वोट दिया जाए

आम व गरीब हिंदुओं को शायद यह लगता है कि हिन्दू-हृदय सम्राट नरेन्द्र मोदी ने राम मन्दिर के रूप में हिन्दू राष्ट्र की नींव डाल दी है। भारत में अब रामराज्य आयेगा और तमाम जनता को रोटी, कपड़ा और मकान आसानी से हासिल होगा। साथ ही यवनों और अधर्मियों को दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया जायेगा! चूँकि ‘हिन्दू राष्ट्र’ में ‘हिन्दू’ शब्द है इसलिए हिन्दू राष्ट्र में हिंदुओं का शासन होगा। और भारत खुशहाल हो जाएगा। लेकिन… सवाल है कि क्या यह सच है?

तथ्यों को परखने पर ऐसा दूर-दूर तक प्रतीत नहीं होता। उल्टे मोदी सत्ता के हिन्दू राष्ट्र से बड़े इज़ारेदार पूँजीपतियों का तानाशाहाना शासन का आभास होता है! जो देशी-विदेशी बड़ी पूँजी को भारत के आम ग़रीब को लूटने की पूरी छूट देगी, चाहे वह किसी भी समाज-जाती से ताल्लुख रखता हो। जिसमें 80 फ़ीसदी लोग कोल्हू के बैल के समान होगा, जिसे चुपचाप, बिना आवाज़ किये खटना होगा। और आवाज़ उठाना अधर्म हिन्दू राष्ट्र के ख़िलाफ़ सीधा अपराध।

शुरुआती प्रमाण मिलने भी लगे हैं। कोलब्लॉक आवंटन व झारखंड जैसे गरीब राज्य का हिस्सा लौटाने के बजाय संकट के दौर में उसके अधिकार जबरन काट लेना इसी का अक्स हो सकता है। क्योंकि भारत में पूँजीपति वर्ग बाधाओं से बेरोकटोक छुटकारा चाहती है। और उनके इस एजेंडे के बीच में हेमंत सोरेन दीवार बन कर खड़े हैं। इन्हीं कारणों से मुख्यमंत्री सोरेन ऋण के आसरे नहीं बल्कि अपनी संसाधनों व मेहनत के आसरे राज्य को विकास के राह पर ले जाना चाहते हैं। जिससे सरकार समेत राज्य की जनता को मोहताज न होना पड़े और कोई प्रतिरोध के आवाज़ को दबा न सके। 

ऐसी बेरोज़गारी भारत ने आज़ादी के बाद से देखी ही नहीं

देश के इजारेदार पूंजीपति मोदी सत्ता के रामराज्य में आम जनता के दोहन के लिए बेलगाम ताक़त चाहती हैं। इसलिए मोदी सत्ता इंद्र के भांति हर वह कवच छीन लेना चाहती हैं जो जनता को संरक्षण देते हैं। चाहे वह श्रम क़ानून हो, पर्यावरणीय क़ानून हो, पब्लिक सेक्टर के रूप में मौजूद हो या फिर अन्य कल्याणकारी क़ानूनों के रूप में मौजूद हो। अपने इन्हीं मंसूबों को पूरा करने के लिए ही तो हज़ारों करोड़ पानी के तरह बहा कर पूँजीपति वर्ग ने नरेन्द्र मोदी को सत्ता तक पहुँचाया है। 

देश में 2014 से लेकर 2018 के बीच आम जनता के उपभोग के स्तर में 9 प्रतिशत की गिरावट आयी है। यानी लोग पहले से कम खा, पहन रहे हैं, कम उपभोग कर रहे हैं। सरकारी आँकड़ों खुद कहते हैं कि पिछले 45 वर्षों में बेरोज़गारी अपने चरम पर है। वास्तव में ऐसी बेरोज़गारी भारत ने आज़ादी के बाद से देखी ही नहीं है। यदि हम लेबर चौक पर खड़े मज़दूर आबादी, बेलदारों, अकुशल निर्माण मज़दूरों, दिहाड़ी करने वालों, तथाकथित ‘गिग इकॉनमी’ में काम करने वाले युवाओं, ठेका मज़दूरों आदि को गिनें तो पाएंगे कि बेरोज़गारी का स्तर भारत के इतिहास में अभूतपूर्व है। 

क्या ये सारे मुसलमान हैं? नहीं! इसमें अच्छी-ख़ासी आबादी आम मेहनतकश हिंदुओं की है। पिछले कुछ हफ्तों के ही दौरान भाजपा-शासित सभी प्रदेशों में मज़दूरों के काम के घंटों को बढ़ाकर 12 घंटे कर दिया गया है। क्या अब सिर्फ़ मुसलमान 12 घंटे काम करेंगे? नहीं! 12 घंटे हाड़तोड़ मेहनत करने वाले इन मज़दूरों में बहुसंख्यक आबादी हिन्दू होगी! 

पर्यावरणीय इजाज़त के नियम-कानूनों से पूँजीपतियों को छूट 

मोदी सत्ता ने बिना राज्यों के मशवरा के पर्यावरणीय इजाज़त के नियम-कानूनों में पूँजीपतियों को छूट दे दी है। जाहिर है इसके परिणामस्वरूप देश में पर्यावरण की जो अपूरणीय क्षति होगी, उसका असर केवल मुसलमानों पर नहीं पड़ेगा? कोयला क्षेत्र, रेलवे और यहां तक कि रक्षा के क्षेत्र में भी निजीकरण और देशी-विदेशी पूँजी की लूट को खुली छूट देने का पूरा इन्तज़ाम कर दिया गया है। जिसका परिणाम छंटनी के रूप में सामने आएगा, बेरोज़गारी बढ़ेगी और ठेकाकरण होगा। इसके भी भुक्तभोगी केवल मुसलमान तो नहीं होंगे? 

मसलन, निजीकरण से सरकारी नौकरियां खत्म हो रही हैं और बेरोज़गारी बढ़ रही है, समूची गरीब जनता को लूटने का ब्लूप्रिंट तैयार कर दिया गया है। यदि कोई इस सच्चाई को जनता के बीच लेकर जाता है, तो उसे ‘हिन्दू राष्ट्र’ का शत्रु करार दिया जाता है, जेलों में डाल दिया जाता है, प्रताड़ित किया जाता है, सोचिए। क्या ‘हिन्दू राष्ट्र’ का यही अर्थ निकल कर सामने नहीं आ रहा। और भाजपा के नेता दुमका उपचुनाव के मंचों से बेशर्मी के साथ जनता से ही पूछते हैं कि क्यों हेमंत सोरेन को वोट दिया जाए। बाबूलाल जी तो भाजपा में जाते ही भूल गए है अब आप ही उन्वोहें बता दे कि क्यों भाजपा के बाजे हेमंत को वोट दिया जाए…  

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