झारखंडी युवाओं को कर रहे हैं गुमराह

बाबूलाल और दीपक प्रकाश झारखंडी युवाओं को कर रहे हैं गुमराह – रघुवर के 5 साल के शासन में कोरोना नहीं था, क्यों नहीं दिया रोज़गार?

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संक्रमण का पहला दौर मद्धम पड़ते ही हेमंत सरकार ने झारखंडी युवाओं को रोजगार देने की ओर, गंभीरता से बढ़ाया था कदम. कौन जानता था मोदी सरकार की गलत नीतियों से आयी दूसरी लहर की तबाही कर देगा बेडा गर्क 

झारखंडी युवाओं को रघुवर दास जब छल रहे थे तब दीपक प्रकाश बीजेपी के प्रदेश महामंत्री थे, उस वक़्त उनमें क्यों नहीं दिखती थी यह तिलमिलाहट  

रांची : सर्वविदित है कि कोरोना महामारी ने झारखंड समेत देश के विकास पहियों को रोक दिया है. रोजगार से जुड़े राज्यों के सारे कवायद धाराशाही हो गए हैं. केंद्र और राज्य सरकारों की प्राथमिकता में जीवन रक्षा ही एक मात्र उद्देश्य रह गया है. ज्ञात हो, संक्रमण का दौर ख़त्म होने के बाद ही राज्य सरकारें रोजगार के दिशा कदम उठा सकेगी. हाँ केंद्र यदि चाहे तो इस दिशा में बेहतर प्रबंधन कर सकती है, अभी तक उसके द्वारा कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है. लेकिन ऐसा प्रतीत होता है, झारखंड का दुर्भाग्य है कि बीजेपी नेता अपने निजी हित को साधने के लिए राजनीति का इस्तेमाल एक हथियार के रूप में करते हैं.

इस फेहरिस्त में बाबूलाल मरांडी और बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष दीपक प्रकाश जैसे नेता भी शामिल हैं. क्योंकि बाबूलाल सहित तमाम बीजेपी नेता केंद्र के समक्ष तो गूंगे हैं, लेकिन झारखंड सरकार को महामारी में युवाओं के रोज़गार न दे पाने जैसे मुद्दे पर घेरने का प्रयास करते देखे जा रहा हैं. बेरोजगार युवाओं की चिंता करना अच्छी पहल मानी जा सकती है. लेकिन, जिस मुद्दे पर केंद्र तक हथियार डाल चुकी हो वहां झारखंड के मुख्यमंत्री से संकट काल में सवाल उठाना, भाजपा की नीयत पर सवाल खड़े करते हैं. क्या ऐसा करने के पीछे बाबूलाल जी व दीपक प्रकाश का झारखंडी युवाओं को गुमराह करने के प्रयास तो नहीं. 

क्योंकि, रघुवर दास अपने 5 साल के शासन में जब झारखंडी युवाओं को रोजगार के नाम पर छल रहे थे, तब दीपक प्रकाश ही बीजेपी के प्रदेश महामंत्री थे. और उस दौर में राज्य में कोरोना महामारी जैसी त्रासदी भी नहीं थी. फिर महामंत्री दीपक प्रकाश का दिल क्यों नहीं कचोटा. क्यों यह रुदन वह तब नहीं दिखा पाए. ऐसे में अबोध भी कयास लगा सकता है कि बीजेपी नेताओं द्वारा राजनीति का इस्तेमाल केवल निजी हित को साधने के लिए की जाती है.

हेमंत सरकार में शुरू हुई थी रोजगार पर विशेष पहल, बीजेपी की गलत नीतियों से दूसरी लहर के घातक तबाही ने बेड़ा गर्क कर दिया 

ज्ञात हो, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन द्वारा स्वयं रोजगार की दिशा में बड़ी पहल किया गया था. जिसके अक्स में कार्मिक विभाग को सख्त निर्देश दिए गए थे. विभागवार रिक्त पदों पर विज्ञापन निकालने की कवायद शुरू हुई. राज्य में पहली बार 7वीं, 8वीं, 9वीं और 10वीं सिविल सेवा का संयुक्त विज्ञापन भी निकाला गया. परीक्षा लेने की तिथि भी 2 मई निर्धारित हुई. संस्थानों ने परीक्षा लेने की तैयारी भी की. ऐसे में कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर ने महामारी के रूप में राज्य में दस्तक दी. और भाजपा के नेता-कार्यकर्ताओं ने परीक्षा रद्द करने को लेकर शोर मचाई. तब झारखंड को कहां पता था कि इनका यह चिंता राज्य हित में नहीं बल्कि निजी हित थी.

मोदी सरकार की गलत नीतियों व असंवेदनशीलता के कारण संक्रमण जन-जीवन को तितर-बितर करने लगी. देश ऑक्सीजन के अभाव में हांफ रही थी. मोदी सरकार ने राज्यों को उसके भरोसे छोड़ दिया था. ऐसे में राज्य के लिए एक बार फिर स्वास्थ्य सुविधा प्राथमिकता बन गयी. और रोजगार के सपने अधर में अटक गए. निसंदेह हेमंत सरकार की बेहतर प्रबंधन ने अल्प संसाधन के बीच महामारी के घातक वेग को शांत किया. लेकिन झारखंडी युवाओं से रोजगार ने थोड़े वक़्त के लिए और दूरी बना ली.

बाबूलाल मरांडी की सोच के सच को झारखंडी जनता समझती है

बाबूलाल मरांडी की राजनीतिक नैतिकता का आकलन बीजेपी में शामिल होने के महज छह माह के जीवन काल से ही समझी जा सकती है. जेवीएम में रहते जिस बाबूलाल ने मोदी सरकार और रघुवर सरकार पर रोजगार नहीं देने के आरोप लगाए. जेवीएम के चुनावी घोषणा पत्र में सत्ता में आते ही रोजगार पर विशेष जोर देने का जिक्र था. यकायक महत्वाकांक्षा पूरी न हो पाने के कारण वह बीजेपी में शामिल हो राज्य को चौका दिया. और उनकी विचारधारा में 180 डिग्री के बदलाव हुए. जहाँ पिछले 7 साल से मोदी सरकार पर करोड़ों रोजगार पैदा न कर पाने का आरोप बाबूलाल द्वारा लगाया जा रहा था वहां वह फिर भाजपा विचारधारा के भक्त हो गये. और उनके जुबान में ताला लग गया.

दीपक प्रकाश ने लॉकडाउन का दिया था सुझाव, बतायें आखिर लॉकडाउन में परीक्षायें आयोजित कैसे हो सकती थी?

बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष दीपक प्रकाश हेमंत सरकार को पहले लॉकडाउन लगाने का सलाह देते हैं. उनके नेता-कार्यकर्ता परीक्षाओं को रद्द करने की वकालत करते हैं. फिर संक्रमण काल में पूछते हैं कि सरकार रोजगार के वादे कब पूरा करेगी. मसलन, वह भाजपा सरकार में उत्पन्न युवाओं के पीड़ा को हेमन्त सरकार की तरफ चालाकी से मोड़ रहे है. जो मौकापरस्त राजनीति का स्पष्ट उदाहरण हो सकता है. बीते 18 अप्रैल को संपन्न हुई सर्वदलीय बैठक में लॉकडाउन पर क्यों उनके द्वारा इतना जोर दिया जा रहा था, अब समझी जा सकती है.

ऐसे में दीपक प्रकाश को जरूर बताना चाहिए कि लॉकडाउन में कोई सरकार रोजगार से सम्बंधित परीक्षाएं कैसे आयोजित कर सकती है? आज दीपक प्रकाश प्रदेश अध्यक्ष और सांसद भी हैं, तो सरकार से सवाल पूछ रहे हैं. पूछना भी चाहिए, लेकिन उन्हें यह भी बताना चाहिए, जब रघुवर सरकार की सत्ता थी और वे प्रदेश बीजेपी महामंत्री थे. उस वक़्त जब झारखंडी युवाओं को रघुवर सरकार द्वारा रोजगार को लेकर छला जा रहा था. वे खामोश क्यों थे. उनकी यह चिंता, यह तिलमिलाहट तब क्यों नहीं दिखी.

मोदी सरकार की गलत नीतियों के कारण देश में है न्यूनतम बेरोजगारी दर 

बीजेपी नेताओं द्वारा शायद मोदी सरकार की विफलताओं को छुपाने के लिए, सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए, राज्य के युवाओं की पीड़ा को दूसरी तरफ मोड़ने के लिए, तमाम बयान दिए जा रहे है, कवायदें की जा रही है. अन्यथा वह बेरोजगारी की त्रासदी के मद्देनजर युवाओं की दुर्दशा पर केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराते, न कि राज्य सरकारों को. क्योंकि, मोदी सरकार की गलत नीतियों के कारण देश पिछले 48 सालों में, बेरोजगारी की सबसे न्यूनतम दर पर खड़ा है. और मोदी सरकार का इस सम्बन्ध में कोई बड़ा कदम उठाने के बजाय सेन्ट्रल विस्टा जैसे प्रोजेक्ट पर अरबों खर्च करना, जरुर सवाल खड़े करते हैं.

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