झारखण्ड : आखिर सामंतवाद को ओबीसी सरकार व आदिवासी क्यों खटकते है?

झारखण्ड : विश्व आदिवासी दिवस पर देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति द्वारा शुभकामना संदेश न दिया जाना, सामंतवाद के कुंठा की पराकाष्ठा. और भाजपा सांसद निशिकांत दुबे द्वारा इस मुद्दे पर लिखने-बोलने के बजाय ओबीसी सरकार पर सवाल उठान – सोचनीय विषय…  

रांची : देश के लोह पुरुष सरदार पटेल कहते थे कि – “हम आदिवासी से नहीं लड़ सकते क्योंकि ए लोग आजादी की लड़ायी 1857 से पहले लड़ते रहे हैं. आदिवासी ही देश के सच्चे राष्ट्रवादी हैं”. लेकिन मौजूदा परिस्थिति में जब देश भर में आदिवासियों की दुर्दशा हो रही है. उसके जल, जंगल, जमीन, सांस्कृतिक धरोहरों और सरकारों पर सामंतवादियों द्वारा खुले आम हमले हो रहे हैं. ऐसे दौर में देश के प्रधानमंत्री ने गाजे-बाजे के साथ देश को पहला आदिवासी राष्ट्रपति “महामहिम द्रौपदी मुर्मू” दिया. जो निश्चित ही देश के बाहुजनो के लिए खुशी की बात है. 

सामंतवाद

ज्ञात हो, साल 1994 से संयुक्त राष्ट्र संघ के पहल पर प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को देश के प्रथम मूलवासी आदिवासी समेत भारत द्वारा विश्व आदिवासी दिवस धूम-धाम से मनाया जाता है. 11 जुलाई 2011, के राष्ट्रपति शुभकामना संदेह में श्रीमति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल द्वारा कहा गया था कि इस अवसर बुद्धिजीवियों और चिंतकों के बीच विचार-विमर्श से आदिवासियों के विकास हेतु कार्य योजनाएं बनाने में सहायता मिलेगी. 

देश के लिए खुशी की बात है कि इस परंपरा को हेमन्त सरकार द्वारा निभायी गयी. झारखण्ड में दो दिवसीय महोत्सव का आयोजन हुआ. लेकिन, वहीं दूसरी तरफ देश के लिए दुर्भाग्य है कि राष्ट्रपति द्वारा बधाई संदेश की परिपाटी के स्वस्थ शुरुआत के बावजूद देश के प्रधानमंत्री मोदी और महामहिम मुर्मू द्वारा शुभकामना संदेश न दिया जाना, न केवल गंभीर सवाल खड़े करते हैं, सामंतशाही विचारधारा की कुंठा की पराकाष्ठा को भी दर्शाता है. 

निशिकांत का ट्वीट भाजपा की पिछली बिहार सरकार से पल्ला झाड़ने का प्रयास 

ऐसे में इस गंभीर मुद्दे पर भाजपा सांसद निशिकांत दुबे द्वारा एक भी शब्द लिखने-बोलने के बजाय यह ट्वीट किया जाना कि बिहार में पिछले 32 वर्षों से पिछड़े वर्ग के लोगों का ही शासन है. विषय सोचनीय है. उनका यह बयान जहां एक तरफ भाजपा की पिछली सरकार से पल्ला झाड़ने का प्रयास भर है. वहीं दूसरी तरफ सामंतवादी सोच को स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है. और सामाजिक मंच पर सवाल खड़ा करता है कि आखिर सामंतवाद को ओबीसी सरकार व समाज क्यों खटकता है?

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