झारखण्ड : आदिवासी संस्कृति हेमन्त शासन में ही होंगे संरक्षित, धर्मगुरुओं को मिला आर्थिक सम्मान

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झारखण्ड : आदिवासी संस्कृति के संरक्षण में मुख्यमंत्री लगातार ले रहे बड़े निर्णय. जनजातीय धर्मगुरूओं को मिला आर्थिक सम्मान. इस दिशा में धुमकुड़िया भवन, सरना स्थल सौंदर्यीकरण के रूप में उभरी है सीएम की स्पष्ट सोच…

धुमकुड़िया भवन, सरना स्थल सौंदर्यीकरण सीएम की इसी सोच का परिणाम, आदिवासी परंपरा और संस्कृति को बचाना सभी की जिम्मेदारी

रांची : झारखण्ड के इतिहास में पहली बार हेमन्त सरकार में आदिवासी संस्कृति-परम्परा को संरक्षित करने का ऐतिहासिक व इमानदार प्रयास हुआ है. इस सम्बन्ध में मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन का मानना है कि उनकी सरकार हर स्तर पर जनजातीय संस्कृति को बचाने के लिए संकल्पित हैं. लेकिन, इसमें राज्यवासियों की भागीदारी भी जरुरी है. क्योंकि आदिवासी राज्य ही नहीं देश का भी ऐतिहासिक धरोहर है. मसलन, झारखण्डवासियों की जिम्मेवारी है कि वह आदिवासी परंपरा-संस्कृति को बचाने के लिए आगे आए.

सरकार के स्तर पर जनजातीय संस्कृति को बचाने के लिए मुख्यमंत्री के नेतृत्व में निर्णय लिया गया है कि ग्राम प्रधान ग्रामीण क्षेत्रों के विकास में 25 लाख रुपये तक की राशि खर्च कर पाएंगे. इसके अलावा जनजातीय धर्मगुरूओं के संरक्षण में उन्हें आर्थिक सम्मान मिलना जरुरी है. सरना स्थलों, धुमकुड़िया भवन जैसे आधारशिलाओं को संरक्षण की आवशयकता है. हेमन्त सरकार इस दिशा में तेजी से काम कर रही है. मुख्यमंत्री के प्रयासों को देखते हुए माना जा सकता है कि हेमन्त सोरेन जैसा आदिवासी जननेता ही जनजातीय संस्कृति को संरक्षित कर पाएंगे. 

परंपरागत ग्राम प्रधान, मानकी मुंडा, मांझी व पाहन की अध्यक्षता वाली ग्राम सभा 25 लाख रुपये तक का कर सकेगी खर्च

आदिवासी संस्कृति और कला केंद्रों के विकास के लिए परंपरागत ग्राम प्रधान, मानकी मुंडा, मांझी व पाहन की महत्ता झारखण्ड को समझा होगा. और इनकी अध्यक्षता वाली ग्राम सभा में 25 लाख रुपये तक का कार्य करने का अधिकार देना निश्चित रूप से समुदाय को विकास गति देगा. ज्ञात हो, यह खर्च चयनित लाभुक समिति के माध्यम से होगी और अनुसूचित क्षेत्रों में वित्तीय अधिकार सौंपने की योजना पर कल्याण विभाग द्वरा सहमति मिल चुकी है. 

ज्ञात हो, 25 लाख रुपये तक की राशि का इस्तेमाल आदिवासी संस्कृति, कला केंद्र, मांझी भवन, मानकी मुंडा भवन, परहा भवन, परगना भवन, धुमकुड़िया भवन, गोड़ासे निर्माण व मांझी थान शेड निर्माण के लिए खर्च हो सकेगी. जिन ग्रामों में ग्राम प्रधान, मानकी मुंडा, पाहन या मांझी नहीं हैं, वहां मान्यता प्राप्त परंपरागत समितियों के माध्यम से योजना को धरातल पर उतारा जायेगा. वित्तीय वर्ष 2022-23 में सरकार की इस महत्ती योजना में 85.50 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है.

राजधानी में ही दो धुमकुड़िया स्थल की हेमन्त सोरेन द्वारा रखी गई है नींव

जनजातीय संस्कृति के संरक्षण में मुख्यमंत्री द्वारा राजधानी में दो धुमकुड़िया स्थलों की नींव रखी गई है. पहला रांची के हरमू में, जो आज सरना स्थल के रूप में जाना जाता है. दूसरा करमटोली (रांची) में बनने वाले केंद्रीय धुमकुड़िया भवन. मुख्यमंत्री ने नींव रखने के साथ स्पष्ट किया है कि यह अनूठा ऐतिहासिक प्रयास आने वाली पीढ़ी को सामाजिक संस्कारों से जोड़ने में मील का पत्थर साबित होगा. 1.50 करोड़ की लागत से करमटोली में बनने वाला धुमकुड़िया भवन का निर्माण 12 महीनों में पूरा होगा. सीएम ने उम्मीद जतायी है कि धुमकुड़िया भवन राजनीति से अलग हटकर समाज के उत्थान में हमें प्रेरित करेगा.

5 करोड़ रासी से सिरोमटोली सरना स्थल का सौंदर्यीकरण, जाहेर स्थान मसना आदि का भी सरकार करेगी संरक्षण

 हेमन्त सरकार राजधानी के सिरोमटोली सरना स्थल का सौंदर्यीकरण हेतु करीब 5 करोड़ का उपबंध हुआ है. स्वयं मुख्यमंत्री द्वारा इसकी नींव रखी गई है. मुख्यमंत्री के निर्देश पर कल्याण विभाग द्वारा सरना, जाहेर स्थान, हड़गड़ी व मसना के संरक्षण में विकास की योजना शुरू हुई है. जनजातीय संस्कृति-परंपराओं का संरक्षण के उद्देश्य में सरना, जाहेर स्थान, हड़बड़ी व मसना की घेराबंदी की जायेगी. इन स्थानों पर चबूतरा निर्माण, सौर विद्युत आपूर्ति, पेयजल की व्यवस्था जैसे विकास कार्य भी किया जायेगा. वित्तीय वर्ष 2022-23 में इसके लिए 175 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है.

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