2016 में बिना बहस 3 मिनट में CNT/SPT संशोधन बिल पारित करने वाली भाजपा आज आदिवासी प्रेमी कैसे ? 

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CNT/SPT

भाजपा ने 2016 में बिना बहस के महज तीन मिनट में CNT/SPT संशोधन बिल पारित कर दिया था. कृषि भूमि की प्रकृति को गैर-कृषि में बदलने के लिए जानबूझकर राज्य में भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापना कानून 2013 को लागू नहीं किया. और सदन में अवैध जमीन हस्तांतरण मुद्दे पर चुप्पी साध लेना, भाजपा के आदिवासी प्रेम की पोल खोलती है.

ज्ञात हो, निशिकांत दुबे, भागलपुर के बाशिंदे, भाजपा सांसद, ने अनुच्छेद 370 के बाद झारखंड के सीएनटी/एसपीटी CNT/SPT एक्ट में संशोधन की वकालत की थी. उस दौर में, नेता प्रतिपक्ष रहे हेमंत सोरेन ने कहा था कि बीजेपी की सदैव मंशा रही है कि यहां के आदिवासियों का सुरक्षा कवच तोड़ा जाए. लेकिन झारखंड के अर्जुन मुंडा सरीखे भाजपा के आदिवासी नेता उस दौर में भी चुप थे.

जबकि इस फर्जी डिग्रीधारी, भाजपा के सदाचारी सांसद, निशिकांत दुबे का सच उस दौर में उभरा जब झारखंडी जनता कोरोना संकट से लड़ रही थी. झारखंड संक्रमण से लड़ रहा था तब उनकी मजबूरियों का फ़ायदा उठा, सांसद महोदय अपनी पत्नी के नाम पर, देवघर के एलओकेसी धाम की 18.94 करोड़ स्टाम्प-वैल्यू  की जमीन, महज 3 करोड़ में, सत्ता का दुरूपयोग कर खरीद रहे थे. जो भाजपाई धर्मात्माओं का चरित्र-चित्रण व भाजपा की मंशा समझने के लिए उदाहरण हो सकता है. 

रघुवर सरकार ने 2016 में बिना बहस कराये महज तीन मिनट में सीएनटी/एसपीटी में संशोधन बिल को पारित कर दिया था

सीएनटी/एसपीटी (CNT/SPT) छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908 एवं संताल परगना काश्तकारी अधिनियम 1949 में भारी विरोध के बावजूद, इसी भाजपा की रघुवर सरकार ने 2016 में बिना बहस कराये महज तीन मिनट में संशोधन बिल को पारित कर दिया था. भारी विरोध के बीच तब तो सफल न हो सके, लेकिन गुपचुप तौर पर इसे ख़त्म करने के लिए फिर भी जतन करते रहे. अब सरकार में तो नहीं रहे, लेकिन हेमन्त सरकार में सीएनटी/एसपीटी को मिल रहे मजबूतीकरण प्रक्रिया को फर्जी एजेंडे से रोकना भर चाहती है. 

भाजपा क्यों चाहती थी हटाना सीएनटी/एसपीटी (CNT/SPT)?

दरअसल, सीएनटी/एसपीटी कानून में संशोधन कर भाजपा कृषि भूमि को गैर-कृषि घोषित करना चाहती थी. और फिर राज्य के विकास के नाम उन जमीनों को अपने चहेते पूंजीपति कारपोरेट आकाओं को सौपना चाहती थी. अदानी पॉवर प्लांट इसका जीता जागता उदाहरण हो सकता है. ज्ञात हो, भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापना कानून 2013 के धारा- 10 में प्रावधान था कि कोई भी विकास कार्य के लिए कृषि भूमि का अधिग्रहण नहीं किया जा सकता, यदि अनिवार्य स्थिति में ऐसा होता है तो रैयत को जमीन का मुआवजा और पुनर्वास के साथ अधिगृहित कृषि भूमि के बराबर अन्य जगह खेती की जमीन उपलब्ध करानी होगी.

लेकिन, भाजपा के उस रघुवर सरकार में जानबूझकर राज्य में भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापना कानून 2013 को लागू नहीं किया गया. और इस कानून से बचने के लिए कृषि भूमि की प्रकृति को ही गैर-कृषि में बदलने के लिए पहल कर दिया गया था. ताकि रैयत यदि ज़बरदस्ती अधिग्रहण के समय न्यायालय का शरण लें तो सरकार कृषि जमीन को गैर-कृषि बताकर बच सके. साथ ही कृषि भूमि पर गैर-कानूनी निर्मित अपार्टमेंट, होटल, शॉपिंग माल आदि प्रतिष्ठानों को एक प्रतिशत गैर-कृषि लगान देकर नियमित कर सके. मतलब गैर-कानूनी कार्य कानूनी बनाने के प्रयास हुए. 

भाजपा का खुद को आदिवासी-मूलवासी हितैषी बताना महज एक आडम्बर

मौजूदा दौर में उस भाजपा का खुद को आदिवासी-मूलवासी हितैषी बताना महज आडम्बर भर है. और आदिवासी-मूलवासी की भलाई के नाम पर सदन न चलने देना नौटंकी नहीं तो और क्या करार दिया जा सकता है. यह महज एक आरोप भर नहीं है. इसका अस्पष्ट उदाहरण सदन में ही देखने को मिला. 

विधानसभा में चर्चा के दौरान राज्य में जब जमीन के अवैध हस्तांतरण का मुद्दा भी उठा. मामले में जवाब देते हुए मुख्यमन्त्री ने कहा कि राज्य में जमीन हस्तांतरण की जानकारी सरकार को है. उन्होंने कहा कि यह एक गंभीर मामला है. और विधानसभा की जांच कमेटी बनने की बात कही.  मुख्यमन्त्री ने अपने जवाब में जता दिया कि वह जमीन हस्तांतरण मामले को गंभीरता से ले रहे हैं. लेकिन मामले में भाजपा की चुप्पी ने जाता दिया कि उसे आदिवासी-मूलवासी समस्या से कोई मतलब नहीं. वोट की खेती के मद्देनजर वह बाहरियों के पैरोकार भर है. और उसका आदिवासी प्रेमी दिखना केवल राजनीतिक रोटी सेंकना भर है.

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