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म.वी.राव

एम.वी.राव को डीजीपी का प्रभार सौपा गया

क्या एम.वी.राव झारखण्ड पुलिस व्यवस्था को नयी दिशा दे पाएंगे

सवाल यह नहीं है कि रघुवर दास के शासन में पुलिस व्यवस्था लचर रही, या कहें कानून के तहत बकोरिया कांड जैसी घटनाएँ हुई। सवाल तो यह है कि कैसे डीके पाण्डेय जैसे डीजीपी के नाम फ़र्ज़ी ज़मीन खरीद फरोख्त में सामने आया। असल में अपराधियों पर बरते जाने वाली कार्यशैली में वह राजनीति दिखी जिसमें सत्ता की खुमारी ने दबंगई को हमेशा बचाया। जहाँ पहली बार मानसिक तौर सत्ता के पीछे खड़ा हो पुलिस विभाग ने अपनी कर्त्तव्यों की समझ ख़त्म की। यानी अपराध पर नकेल कसने या बाहुबलियों को सलाख़ों के पीछे भेजा गया, उसमे न केवल सत्ता समीकरण छाप दिखी, पूरी व्यवस्था को मनमानी करने का संस्कार भी सिखाया। 

इसी व्यवस्था पर लगाम लगाने के दृष्टिकोण से झारखंड की हेमंत सरकार ने डीजीपी के.एन.चौबे का ट्रान्सफर करते हुए एम.वी.राव को प्रभार दिया गया है। केएन चौबे झारखंड कैडर के 1986 बैच के आइपीएस हैं, जबकि एमवी राव 1987 बैच के अधिकारी हैं। इस संबंध में गृह विभाग की ओर से अधिसूचना जारी की जा चुकी है। यूपीएससी से संपुष्टि के बाद राव पूर्ण डीजीपी बन सकेंगे।

एम.वी.राव लंबे समय तक राज्य से बाहर रहे हैं। केंद्रीय प्रतिनियुक्ति से लौटने के बाद उन्हें 13 नवंबर 2017 को सीआइडी का एडीजी बनाया गया था। इस पद पर वे ज्यादा दिनों तक टिक नहीं पाए। एक महीने के भीतर ही यानी 13 दिसंबर 2017 को सरकार ने उनका स्थानांतरण विशेष कार्य पदाधिकारी पुलिस आधुनिकीकरण कैंप नई दिल्ली के पद पर कर दिया था। अभी एक महीने पहले ही सरकार ने उन्हें गृह रक्षा वाहिनी सह अग्निशमन के डीजी के पद पर पदस्थापित किया था।

मसलन, राष्ट्रीय प्रतीक चार मुंह वाले शेर की तरह निकलने वाले एम.वी.राव क्या झारखण्ड की पुलिस व्यवस्था को नया दिशा दे सकते हैं। जहां बलात्कार होता है। हत्या होती है। एफ़आईआर दर्ज नहीं होती। जहाँ संविधान तक अपनी  महत्ता खोने को है वहां क़ानून का राज स्थापित करने में कितने सफल हो सकते हैं यह तो वक़्त ही बताएगा।

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