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झारखण्ड को किसने सालों पीछे धकेल दिया

झारखण्ड देश का ऐसा राज्य है, जहाँ सबसे ज्यादा ग़रीबी व कुपोषण है और ऐसा भी राज्य है जो देश का न केवल सबसे अधिक खनिज सम्पदा बल्कि नैसर्गिक सौंदर्यता का भी मालिक है। लेक़िन इस दौर में रोज़गार का सवाल भी यहाँ सबसे बड़ा हो चला है, क्योंकि न केवल बीते एक दशक के आर्थिक सुधार ने, मंदी ने भी हज़ारों नौकरियाँ लील ली। फ़ैक्टरियाँ से लेकर छोटे उद्योग धंधे तक ख़त्म होने के कगार पर आ खड़ी है। जिसका सीधा असर झारखण्डी लोगों पर पड़ा है जिसके कारण यहाँ पलायन जैसी त्रासदी सच बन कर उभरा है। संयोग से गैर झारखंडी में भी कमोवेश ऐसी ही आर्थिक परिस्थिति देखने को मिल रही है। जो न केवल भाषा व रोज़गार, राजनीतिक कारणों के लिहाज से यहाँ के संसाधनों का व्यपारियकरण अपने अनुकूल पा यहाँ पहुँचते हैं।

आज जब इस प्रदेश के 19 बरस को टटोलते हैं तो पाते हैं सियासत ने झारखण्ड को कई साल पीछे धकेल दिया है। जाहिर है भाजपा सबसे ज्यादा 16 वर्षों तक सत्ता में रही तो ज़िम्मेदारी उसकी सबसे अधिक बनती है। अब जब सालों बाद झारखण्ड भाजपा के कालचक्र से छूटा, या कहें उनके अप्रत्यक्ष शोषण से आज़ाद हुआ। तो लोगों के चेहरे पर ख़ुशी की रेखा साफ़ दिखती है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। इंकार तो इससे भी नहीं किया जा सकता कि झारखण्ड अपने बुरे अतीत को भुलाकर नए राह पकड़ते हुए विकास की बाँट जोत रहा है। क्योंकि प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण यह प्रदेश देश को रोशन करता है लेकिन खुद अंधकार के साये में जीने को मजबूर है। राज्य के अब भी लाल पानी पीने को मजबूर हैं। क्या कुछ नहीं सहा है यहाँ की जनता ने पिछले 19  वर्षों में।

झारखण्ड को सीधे मुख्यमंत्री से गुहार क्यों लगानी पड़ती है

परिस्थितियां बताती हैं कि जहाँ इतने वर्षों में यहाँ लोगों को उनके मूलभूत सुविधाओं के साथ जीवन-बसर करने की आज़ादी होनी चाहिए थी, वहाँ लोग हाथ में राशन कार्ड लेकर मरे हैं। ब्लॉक से लेकर जिला स्तर तक सरकारी अधिकारियों की संवेदनशीलता का पैमाना केवल इतने भर से मापा जा सकता है। पिछली गैर-ज़िम्मेदाराना सरकार से थक हार कर यहाँ की ग़रीबों वंचित समेत तमाम जनता ने एक झारखंडी, हेमंत सोरेन को अपना मुख्यमंत्री चुना। जो आज उनके सपनों पर खरे उतरते नजर भी आते हैं। दिलचस्प यह है कि प्रदेश के लोग बेधड़क मुख्यमंत्री के ट्विटर हैंडल को टैग कर सरकारी अधिकारियों की अनदेखी जैसे ग़रीबी, पेंशन, राशन, छात्रवृत्ति, बिजली, रोज़गार जैसे समस्या के लिए गुहार लगाते हुए देखे जा रहे हैं। 

मसलन, सरकारी बाबुओं की वानगी देखिये आज भी यहाँ गरीब अपनी मूलभूत सुविधाओं के लिए इतना तरस रहा है कि उन्हें सीधा मुख्यमंत्री से गुहार लगाना पड़ता है। यह कब थमेगा पता नहीं, मगर राज्य के मुख्यमंत्री को इसे त्वरित गति से थामने का प्रयास जारी रखना होगा। तभी झारखण्ड, झारखंडियात और झारखंडवासी विकास की राह पर सशक्त हो आगे बढ़ सकेंगे।

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