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मेनस्ट्रीम मीडिया

मेनस्ट्रीम मीडिया को राह दिखाते हेमंत सोरेन

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मीडिया व सत्ता गठजोड़ में न केवल पत्रकारिता को कुंद, उसकी धार भी भोथरी हो चली है, जो अब छिपाए नहीं छिपती। मेनस्ट्रीम मीडिया ने अपने चमक को खुद ही ख़त्म करते हुए अपनी विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़े कर लिए। जहाँ एक यह साफ़ है कि केन्द्रीय सत्ता ने सुपरपॉवर बनने की लालसा में व्यवस्थित ढंग से मीडिया को ही खत्म कर दिया तो वहीं मीडिया ने पूँजी की हवस में बन अपने ही पत्रकारों के कलम/ज़ुबान ऐसा काटा, पत्रकारिता की डाल ही काट दिए। जाहिर है कि ये ऐसे सवाल हैं, जो बीते पाँच बरस में कहीं तेजी से सतह पर उभरे हैं। 

आज न्यूज़ चैनलों के स्क्रीन व अखबारों के पन्नों से जिस अंदाज़ में जन मुद्दों के सरोकारों से यू टर्न ले मुद्दों से भटकाव की दिशा में मुड़ चले हैं, निस्संदेह समाज में टकराव के कारण बनेंगे। सीधे तौर पर कहा जा सकता है कि, सत्ता के अनुकूल लगने की जद्दोजहद में मीडिया के भीतर जिस प्रकार पत्रकारिता पीछे छूट गयी, उसके भविष्य पर कई आंशकाये उभारती है। क्योंकि आज इसके सामानातांर डिजिटल मीडिया व सोशल मीडिया आप ही रेंगते मुद्दों से सरोकार बनाते हुए सामने कड़ी हुए है, चुनौती ज़रुर देती है। यह चुनौती इस मायने में भी मेनस्ट्रीम मीडिया के लिए गंभीर है, मीडिया गठजोड़ से बेदखल काबिल पत्रकारों को समाज में उनकी उपयोगिता साबित करने का प्लेटफोर्म मुहैया कराती है। 

ऐसे में राँची प्रेस क्लब के नवनिर्वाचित शपथ ग्रहण समारोह में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का मुख्य अतिथि के तौर पर उपस्थिति, वही आज सियासत व मीडिया का गठबंधन का नाम दे रही है। आप जो चाहे इसका नाम दे सकते हैं, लेकिन हेमंत सोरेन द्वारा यह कहा जाना कि मीडिया समाज का वह आईना होता जिसमे जनता के वह मुद्दे दिखने चाहिए, जहाँ सरकार की नजर नहीं जा पाती है। मतलब साफ़ है प्रेस क्लब के मंच से मुख्यमंत्री ने मेनस्ट्रीम मीडिया को चेताते हुए जीवन दान देने का प्रयास किया है। जहाँ वह अपने माथे पर लगने वाले इल्जामों से मुक्ति पा सकती है।

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