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सी पी सिंह

सी पी सिंह जी झारखंडी पत्रकार भाजपा के कर्मचारी नहीं 

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भाजपा की सियासत में अब पत्रकारों की हैसियत एक प्यादे भर की भी नहीं रही। राज्य सत्ता ने पहले तो जनता से अपने सरोकार ही ख़ारिज लिए। मीडिया की समझ थी सत्ता से नज़दीकी उन्हें सुरक्षा व भविष्य देगी, लेकिन उसे तो सत्ता ने घुटने पर ला खड़ा किया है। मौजूदा वक़्त में जो हालात राज्य में मीडिया के हैं, जिस तरह की पत्रकारिता हो रही है, उसमें भाजपा नेता सह नगर विकास मंत्री सी पी सिंह भरी सभा में पत्रकार को ऐसे लताड़ना जैसे वह चौथा स्तंभ नहीं बल्कि उसका कर्मचारी हो, हमें नहीं चौकाता। निस्संदेह, यह घटना झारखंड के पत्रकारिता व मीडिया जगत पर गंभीर सवाल तो जरूर छोड़ती है। 

आज मंत्री सी पी सिंह साहब को लोकतंत्र की मर्यादा का इतना भी ख्याल नहीं रहा कि जब हालात बदलेंगे तो ये कौन सी पत्रकारिता के शरण में जायेंगे। क्या मौजूदा वक्त की पत्रकारिता और मीडिया की यही सच्चाई हो चली है जो भाजपा मंत्री सीपी सिंह ने अपनी टिप्पणी में आंकी है। ये सवाल उतना ही मौजूं है, जितना मौजूं है झारखंडी सपनों का बीजेपी सत्ता के बीच फँस जाना।

मंत्री सी पी सिंह मानसिक दिवालियेपन के शिकार

तो क्या मौजूदा हालात में ये कहा जा सकता है कि इन नेताओं में राज्य कहीं फंस गया है। मानसिक दिवालियेपन के शिकार नगर विकास मंत्री सी पी सिंह को टिप्पणी करने से पहले यह समझना चाहिए कि पत्रकारिता की एक अलग जमात भी है जिसका सरोकार भाजपाई मलाई से कतई नहीं है। इन हालातों को बताने के लिये उनकी पत्रकारिता अभी जिंदा है। जिनके स्याही में 100 वाट की बल्ब की ताकत न सही जीरो वाट की ताकत सही मौजूद है, कम ही सही लेकिन रौशनी देती है। 

ख़ैर जो भी हो, झारखंड की ठंडी पहाड़ियों में चर्चे हैं कि भाजपा के लिए ठंड गहराने वाली है और क्रिस्मस झारखंडियत की होगी। गाहे बगाहे सी पी सिंह जैसों की खीज यह बता ही देती है कि ये अस्त हो रहे हैं और राज्य उदय। जरूरत केवल यह है कि झारखंडी पत्रकारिता व मीडिया अपने कलम की धार तेज करे और अपनी साख पर लगे दाग को मिटाते हुए चौथे स्तम्भ की नींव मजबूत करे।

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