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सरकार और लूटती जनता के बीच एक दीवार

दीवार हैं हेमंत सोरेन -सरकार की नीतियों व जनता के बीच (आत्मकथा) 

मौजूदा सरकार के लिए न टूटने वाली दीवार का नाम है हेमंत सोरेन

भगवान बिरसा मुंडा को नमन करते हुए तमाम झारखंड वासियों को ‘झारखंड स्थापना दिवस‘ की बधाई व शुभकामनाएं। झारखंड सरकार के भूमि अधिग्रहण के तौर तरीके, विकास की लकीर का मापदंड, चंद हाथों को मुनाफ़ा देने का रास्ता है, जो कतई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। इस बहस के बीच आज बचपन याद आ रहा है। बाबा भी याद आए उनके सभी साथी भी।

तब झारखंड अलग नहीं हुआ था, बाबा कहते हैं, बड़ी मुसीबतों के बीच मेरा जन्म 10 अगस्त 1975 में रामगढ़ के नेमरा जैसे ग़रीब ग्राम में हुआ। याद आता है, बचपन की बरसात, फूस के झोपड़ी में चूते पानी से खुद को बचाना, पिता सामान बड़े भाई के साथ चुआं खोद पानी लाना, जीविका के लिए जंगलों से लकड़ी-पत्ते बटोरना, लेकिन पिता के कठोर निर्देश तले ढीबरी के लो में भी अक्षर ज्ञान लेना, गरीबी से जद्दोजहद करती जिंदगी।

बाबा अलग झारखंड के लॉ लिए जंगल-जंगल वास करते थे, कई-कई रातें नहीं सोते थे, उन्हें देखे महीनों बीत जाते थे। उस वक़्त समाज में मौजूद महाजनी प्रथा व झारखंड की बात करने वाले गिने चुने लोग थे। पिता की प्राथमिकता झारखंडी समाज को जगाना था। पिता के साथियों को अलग झारखंड के लिए शहीद होते भी देखा। पिता को गुरु के उपाधि से सुशोभित होते देखा।

माँ को उनको याद करत रोते हुए कई रातों को देखा, याद है मुझे वह हमें पालने के लिए कितनी जतन की, खुद भूखी रह कर भी जैसे-तैसे हमारी पेट भरी, याद है मुझे तेज बुखार था -सारी रात जागी, रोती रही  -कहते वक़्त आँखें नाम हो रही है।

आर्किटेक्चर से राजनीति में दीवार बनने तक का साफर

झारखंड अलग हुआ,, लेकिन की बदहाली में कोई सुधार नहीं हुआ, उन्ही की सरकार बनी जो अलग झारखंड के विरोध में थे  -सरकारें आती रही जाती रही। उस वक़्त मैं राजनीति से दूर आर्किटेक्चर में अपनी भविष्य को तलाशने में जुटा था। अचानक खबर आई कि मेरे पिता सामान बड़े भाई की असामयिक निधन हो गया। माँ दुखी थी पुत्र वियोग में, पिता दुखी थे कि मेरे बाद झारखंडी समाज को कौन देखेगा।

अंततः माता-पिता के आस को जिंदा रखने के लिए मैंने राजनीति में कदम रखा। जब मुद्दों की ज़मीनी हकीक़त से रु-ब-रु हुआ तो उस दिन मेरी बाबा के प्रति आदर और बढ़ गयी। वाकई झारखंड की हालत बदहाल थी…  

14 महीने के लिए इस महान राज्य का मुख्यमंत्री बनने का सौभाग्य मिला, जिसके अधिकांश वक़्त आचार सहिंता में गुज़र गए, इससे इनकार नहीं कि उस वक़्त मुझ मे चतुर राजनीति की समझ थोड़ी कम थी, लेकिन स्वस्थ राजनीति की समझ मुझे विरासत में मिली थी। शायद यही वह वजहें थी कि उस थोड़े वक़्त में झारखंड के बेहतरी के लिए जो लकीर खींचा, अब तक झारखंडी इतिहास कोई भी मुख्यमंत्री उसे पार नहीं कर पाए।

झारखंड की दुर्दशा, लेकिन हेमंत सोरेन दीवार बन खड़े हो गए

वह भी दौर देखा “हर-हर मोदी घर-घर मोदी”, “बहुत हुई अत्याचार अब की बार साहेब की सरकार” और अब रघुवर पार भी देख रहा हूँ  -जब भारत की एकता अखंडता को तो तार-तार किया गया, संविधान को ताक पर रख तमाम संवैधानिक संस्थाओं को तहस-नहस कर दिया गया।

इसी फ़ेहरिस्त में दलित -आदिवासी -मूलवासियों के आरक्षण को प्रोपगेंडा रच न सिर्फ ख़त्म करने का प्रयास हुए, बल्कि इस पांचवी अनुसूची राज्य के ज़मीन-जंगल-खनिज-सम्पदा लुटाने के बावजूद भी जब अर्थ‍यवस्‍था न सुधार पाए तो इन क्षेत्रों से आदिवासियों को ही खदेड़ने की स्थिति रच दी।

न ही यह सरकार जेपीएससी की परीक्षा करा पायी, न ही कर्मचारियों, अनुबंधकर्मियों को उनका हक ही दे पायी। गलत स्थानीय नीति रच यहाँ की नौकरियाँ बाहरियों को लूटा दी गयी।  हर ओर कोहराम मचा है…

अंत में झारखंड के तमाम वर्ग से भगवान बिरसा व झारखंड के स्थापना दिवस के संध्या में मेरी गुज़ारिश है, यह चुनाव आपके व राज्य का भविष्य तय करेगी, इसलिए यह जरूरी हो जाता है कि आप अपने मत का उपयोग गंभीरता नयी झारखंड के नीव में उठने वाली दीवार की एक-एक ईंट के भांति करे।

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