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विधानसभा चुनाव के दौरान गए रेजीडेट व ट्यूटर डॉक्टर हड़ताल पर 

विधानसभा चुनाव के दौरान गए रेजीडेंट व ट्यूटर डॉक्टर हड़ताल पर 

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झारखंड में विधानसभा चुनाव के पहले चरण की अधिसूचना 6 नवंबर तक जारी होने का निर्देश दे दिया गया है प्रत्याशियों का नामांकन प्रक्रिया की शुरुआत इसी दिन से शुरू हो जायेगा और 13 नवंबर तक नामांकन किया जा सकेगाज्ञात हो कि चतरा, गुमला, बिशुनपुर, लोहरदगा, मनिका, लातेहार, पांकी, डालटेनगंज, विश्रामपुर, छत्तरपुर, हुसैनाबाद, गढ़वा व भवनाथपुर विधानसभा क्षेत्रों पहले चरण में मतदान होंगे 

लेकिन, विधानसभा चुनाव के दौरान भी झारखंड में न बेरोजगार युवा के शोर थम रहे हैं और न ही आंगनबाड़ी कर्मियों के प्रतिशोध का ज्वाला अब जहाँ दुमका मेडिकल कॉलेज एण्ड हॉस्पिटल के सीनियर रेजिडेंट पिछले चार महीने से वेतन (Salary) नहीं मिलने के कारण नाराज़ हो कलमबंद हड़ताल (Strike) पर चले गए हैं, ओपीडी (OPD) में अपनी सेवा नहीं दे रहे हैं। साथ ही डॉक्टरों का यह भी कहना है कि अगर एक सप्ताह के अंदर बकाया वेतन का भुगतान नहीं हुआ, तो इमरजेंसी सेवा से भी ये खुद को अलग कर लेंगे

 वहीं हज़ारीबाग़ मेडिकल कॉलेज एंड अस्पताल का फीता कटे अभी तीन माह भी नहीं हुए हैं, यहां की व्यवस्था बिगड़ चुकी है। 4 नवंबर से यहां के चिकित्सक भी हड़ताल पर चले गए हैं। इन चिकित्सकों का हड़ताल भी वेतन की मांग को लेकर ही हैं, यहाँ भी ओपीडी बंद है और मरीज़ों की परेशानी बढ़ गई है। सदर अस्पताल को मेडिकल कॉलेज से अटैच कर दिए जाने के बाद से सदर अस्पताल का हालत और लचर हो चुकी है। 

यही नहीं मुख्यमंत्री जी के शहर जमशेदपुर के महात्मा गांधी मेमोरियल (एमजीएम) मेडिकल कॉलेज अस्पताल की व्यवस्था फिर एक बार से वेंटिलेटर पर है। सभी सीनियर रेजीडेट व ट्यूटर डॉक्टर यहाँ भी 4 नवंबर से कलमबंद हड़ताल पर चले गए हैं। ओपीडी से तकरीबन सौ-डेढ़ सो मरीजों को इलाज के बिना ही लौटना पड़ा है।

डॉक्टरों को पढ़ाई करते वक़्त 80 हजार सीनियर रेजीडेट बनने पर महज 60 हजार

जिन डॉक्टरों को राँची रिम्स में पढ़ाई करते वक़्त 80 हजार रुपये मिलता था उन्हें जा एमजीएम अस्पताल में सीनियर रेजीडेट बनाकर भेजे जाने के बाद उनकी वेतन महज 60 हजार रुपये कर दी गयी है। वह भी तीन-चार महीनों से नहीं दिया गया है। जो राज्य सरकार के कार्यप्रणाली पर सीधा सवाल खड़ी करती है, जबकि अन्य राज्यों में ऐसा नहीं है।

मसलन, साहेब के कारनामों पर न विधानसभा चुनाव के धमक और न आदर्श आचार संहिता गूँज ही मरहम लगा पा रही है। 

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