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एससी-एसटी-ओबीसी अभ्यर्थियों ने पकड़ी उच्च न्यायालय की राह

एससी-एसटी-ओबीसी अभ्यर्थियों ने फिर कहा सरकार को आरक्षण विरोधी 

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रघुवर सरकार का मंशा शुरुआत से ही आदिवासी, मूलवासी, दलित व पिछड़ों के आरक्षण विरोधी प्रतीत होता रहा है। राज्य में कई मौक़ों पर यह सरकार आरक्षण की अनदेखी कर नियुक्तियां व परीक्षाएं आयोजित करवाई। उदाहरण के तौर मामला रिम्स में स्टाफ नियुक्ति का रहा हो या फिर शिक्षक भर्ती का। वर्तमान में वही मंशा छठी जेपीएससी परीक्षा में भी देखने को मिला, जहां एक बार फिर एससी-एसटी-ओबीसी अभ्यर्थियों ने इनपर आरक्षण की अनदेखी का आरोप लगाया। जेपीएससी की प्रारंभिक परीक्षा (पीटी) में आरक्षण का लाभ न देना, जो राज्य के सामाजिक और राजनीतिक संगठनों में उबाल का कारण बना। 

केंद्रीय सरना समिति के अध्यक्ष अजय तिर्की ने अपने बयान में कहा कि इस सरकार में जेपीएससी हमेशा आरक्षण को लेकर विवादों में रही है। इस बार भी प्रारंभिक परीक्षा में आरक्षण का लाभ न देना फिर से उनकी मंशा पर सवाल खड़ा करती है।

अजय टोप्पो ने कहा कि पूर्व में गठित सरकार की नियोजन नीति कमेटी ने छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश राज्यों की समीक्षा कर बताया था कि लोक सेवा आयोग के प्रारंभिक परीक्षा में भी आरक्षण का लाभ दिया जाता है, इसीलिए जेपीएससी में भी दिया जाए। फिर भी झारखंड लोक सेवा आयोग ने प्रारंभिक परीक्षा में आरक्षण का लाभ नहीं दिया। यह जेपीएससी का आरक्षण विरोधी मानसिकता को दर्शाता है।

मसलन, इस सरकार में यह दूसरी बार है जब न्यायालय का फैसला आने के बाद भी एससी-एसटी-ओबीसी अभ्यर्थियों ने छठी जेपीएससी में आरक्षण नियमावली और परीक्षा में हुई धांधली की शिकायत लेकर उच्च न्यायालय की राह पकड़ी है।

अभ्यर्थियों का कहना है कि पहले जो पीटी का रिजल्ट निर्गत हुआ था, उसका आधार पर सही था, लेकिन आरक्षण नियमावली को अनदेखी हुई थी। जब विरोध हुआ तो आयोग ने नियमावली को लागू किये बिना ही दोबारा रिजल्ट निर्गत कर दिया। ज्ञात हो कि 21 अक्तूबर को उच्च न्यायालय ने 34 हजार रिजल्ट को निरस्त करने का आदेश दिया था।

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