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दुष्यंत चौटाला

 दुष्यंत चौटाला झारखंड सरकार के कोसने वाले दल भी हो सकते है!

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झारखण्ड में छठ बाद होने वाली चुनावी घोषणा ने तमाम राजनीतिक दलों की माथापच्ची बढ़ा दी है।  एक तरफ विपक्ष ने गठबंधन की गतिविधि तेज कर दी है तो दूसरी तरफ झाविमो, जदयू व एमआईएम ने अलग राह पकड़ ली है। साथ ही सीटों के बँटवारे को लेकर बीजेपी-आजसू के बीच ठनी तना-तनी की तपीश भी महसूस की जा रही। हरियाणा चुनाव में दुष्यंत चौटाला हाथ लगे बटेर ने राज्य की तमाम छोटी पार्टियों को मौकापरस्ती करने का नयी दिशा दे दी है। चूँकि झारखंड में बीजेपी की स्थिति खराब आंकी जा रही है इसलिए सरकार के विरोधाभास शासन को मुद्दा बना कर चुनावी दंगल में कूदने को ये दलें बेताब है। 

पिछले चुनाव इसके साफ़ उदाहरण हो सकता है, जब कई विधायकों ने चुनाव जीतते ही सीधा बीजेपी की ओर रुख किया था। हालांकि, झारखंड की स्थिति हरयाणा सरीखे नहीं है, खाफी अलग है। यह छठी अनुसूची में आने वाला आदिवासी-मूलवासी बाहुल्य प्रदेश है, जहाँ रोटी, रोजी व ज़मीन बचाने का जद्दोजहद है। यहाँ की जनता ऐसी परिस्थिति पेदा ही नहीं करना चाहेगी, जहाँ त्रिशंकु जैसी हालात बने। राज्य की जनता इस दफा आर-पार लड़ाई का मन बनाती दिखती है। 

जिस प्रकार भाजपा ने विपक्षी विधायकों को सीट का लालच देकर अपनी दल में लायी है, निस्संदेह दूसरी स्थिति पैदा करती है, जहाँ सीटबंटवारा भजपा में अंतरकलह को जन्म देगा। उस क्रम में पार्टी से खफा नेता-विधायक चुनाव लड़ने की मंशा से भाजपा छोड़ेंगे, उस वक़्त ये पार्टियाँ उन्हें लपकना चाहेगी। इस खेल में चुनाव के पहले ही उनके वारे-न्यारे होने की सम्भावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। उन्पर्तियों को इसका फायदा यह होगा कि ये न भी जीत पाए तो चुनावी गणित तो जरूर ही बिगाड़ देंगे। 

हालांकि, यहाँ जनता चुनाव के पहले ही खुद को ठगा महसूस करेगी, इनकार तो इससे भी नहीं किया जा सकता। अलबत्ता, अब तो वक़्त ही बतायेगा कि झारखंडी जनता क्या कदम उठती है। ऊंट को किस करवट बैठाती है… लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि यदि चुनाव परिणाम त्रिशंकु वाले होते हैं, जिसकी सम्भावना नजर नहीं आती, तो भी वह कौन छोटा दल होगा जो यहाँ  दुष्यंत चौटाला वाली भूमिका में नजर आएगी। हाल की राजनीतिक परिस्थियों को देखते हुए इस संभावना को भी सिरे खारिज नहीं किया जा सकता। 

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