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दीवाली बाज़ार

दीवाली की बाज़ार से इस बार रौनक़ ग़ायब दिखी 

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झारखंड में इस बार दीवाली के धनतेरस के मौके पर खरीदारों से गुलजार रहने वाले राज्य के बाजार इस बार बेजार नजर आयी जबकि यहाँ मीडिया झारखंड के साथ बिहार राज्य को जोड़ कर लिखती है कि  इन दोनों राज्यों के बाज़ार में मंदी का कोई असर नहीं देखा गया, लोग ने खुल कर पैसे खर्चे। लेकिन सच्चाई यह है कि बाजार से ख़रीदार लगभग ग़ायब दिखे यह एक अच्छी ख़बर है कि पटाखा बाजार में सन्नाटा पसरा है लेकिन इसकी वजह जागरूकता नहीं बल्कि मंदी है दीवाली पर लोग घर की साज-सजावट पर दिल खोल कर पैसे खर्चते थे, जिन्हें होम अप्लाएंस ख़रीदने होते थे, वे फ़ेस्टिवल सीजन में मिलने वाले ऑफर्स व सेल का इंतजार करते थे। इस बार उन सभों की इच्छा धरी की धरी रह गयी। 

पिछली साल का अखबार उठा कर तुलनात्मक दृष्टिकोण से ही देख ले तो पता चलता है कि लगभग 50 से 60 फीसदी गिरावट हो सकता है जो सदियों पुराने व्यापार के लिए एक बड़ा धक्का साबित हो सकता है। जानकार बताते है कि पहले नवरात्र से 25 दिसंबर तक, त्यौहार के सीजन बाज़ार का पहला चरण माना जाता है पूस के मंदी के बाद बाज़ार वापिस 14 जनवरी से अप्रैल-मई तक खुलता है, शादियों का सीजन तक को व्यापार का दूसरा चरण माना जाता है, लेकिन इस वर्ष व्यापारियों के सामने व्यापार में अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है जिससे व्यापारी बेहद चिंतित भी है। जबकि ये वही व्यापारी हैं जिन पर झारखंड के लाखों लोगों की आजीविका निर्भर रहती है। 

मसलन, मौजूदा बाज़ार की यही सच्चाई है, ग्रामीण क्षेत्रों की बाज़ार की स्थिति तो और भी भयावह है, जो राज्य के अख़बार व मीडिया करोड़ों की सरकारी विज्ञापन रुक जाने के भय में न लिखना चाहती है और न ही दिखाना नहीं चाहती है। जो थोड़ी बहुत ख़रीददारी हुई उसी को बढ़ा-चढ़ा कर बखान करने को विवश हैं 

झारखंड राज्य के नेता प्रतिपक्ष हेमंत सोरेन अपने फेसबुकवाल पर लिखते हैं कि, “इस बार दीवाली बाज़ार से रौनक़ ग़ायब है। आर्थिक मंदी ने जहाँ छोटे व्यापारियों की कमर तोड़ दी है वहीं आम जनता महँगाई की मार भी झेल रही है”।

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