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हरियाणा के ही राह पर चलने को झारखंड भी तैयार

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एक समय ऐसा भी था जब लगने लगा था कि हरियाणा की लगभग ज़मीन अब भाजपा की है। लेकिन जब तानाशाही हद से गुजरती है तो जनता को संतुलन बनाने के लिए फैसले लेने ही पड़ते हैं। इसलिए हरियाणा जनता ने खट्टर सरकार के शासन और प्रशासन के अलावा लचर शिक्षा व्यवस्था का जवाब भाजपा को दे दिया है। एक सोची-समझी साज़िश के तहत वहां के युवा पीढी को नौकरी की जगह- पितृसत्ता, धार्मिक और जातीय कट्टरता का ज़हर देेने के काली प्रयास पर भी जनता ने विराम लगा दिया है। हरियाणा में रोडवेज़ कर्मचारियों ने निजीकरण के ख़िलाफ एक शानदार हड़ताल किया था। हरियाणा की नगरपालिकाओं – नगरनिगमों और नगरपरिषदों में तक़रीबन 30-32 हज़ार कर्मचारी हड़ताल पर थे।

इस हड़ताल में पक्के कर्मचारियों की संख्या बेहद कम थी, ज़्यादातर कच्चे, डीसी रेट पर, ऐड हॉक तथा ठेके कर्मचारी थे, जो विभिन्न प्रकार के कामों को सम्हालते हैं। इनमें विभि‍न्न तरह के कर्मचारी हैं जैसे सफ़ाईकर्मी, माली, लिपिक, बेलदार, चौकीदार, चपड़ासी, अग्निशमन सम्हालने वाले, स्वास्थ्यकर्मी, इलैक्ट्रिशियन, ऑपरेटर इत्यादि। कर्मचारी ज़्यादा कुछ नहीं माँग रहे थे उनकी माँग बस यही है कि हरियाणा की भाजपा सरकार ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में कर्मचारियों के लिए जो वायदे किये थे उन्हें वह पूरे करे। यही नहीं भाजपा एक तरफ़ स्वदेशी का राग अलापती रही और दूसरी तरफ सफ़ाई तक का ठेका विदेशी कंपनियों को दे दिया। 

जनता मंदी व महँगाई से त्रस्त थी, लेकिन भाजपा सरकार इन तथ्यों से इतर अधिनियम 370, 35A व राम मंदिर के घूंटी जनता को पिलाने का प्रयास करती रही। बिलकुल ऐसी ही या इससे दयनीय स्थिति रघुवर सरकार के दौर में झारखंड की है। यहाँ की भी जनता, युवा, कर्मचारी, ठेका मजदूर, आदिवासी, मूलवासी, दलित आदि इनके जनविरोधी नीतियों से त्रस्त हैं और सड़क पर है। लोग यहाँ भूख से मर रहे हैं और रघुवर सरकार सरकारी विद्यालय के छात्र-छात्राओं को भाजपा का टोपी पहनाकर, 370, 35A व राम मंदिर का राग सुना रही हैं। राज्य में इनके तानाशाही का आलम यह है कि इनकी पुलिस झारखंडी बहु-बेटी-बहनों पर लाठियाँ बरसा रही है। 

अलबत्ता, देखा जाए तो मुख्यमंत्री रघुवर जी ने झारखंड को हरियाणा की राह पर लाकर खड़ा कर दिया है। जिसका सीधा मतलब है कि झारखंडी जनता ने भी कमर कस ली है और इन्हें छत्तीसगढ़ भेजने का मन बना लिया है 

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