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सदान मोर्चा

सदान व मूलवासियों को उनके अधिकार दिलाएंगे हेमत सोरेन 

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छोटा नागपुर और और उसके आसपास के क्षेत्र, ऐतिहासिक रूप से झारखंड के नाम से जाना जाता है। इस क्षेत्र के मूलवासी, जो आदिवासी नहीं हैं, वे ‘सदान’ कहलाते हैं। झारखंड में अनुसूचित जनजातियों या आदिवासियों के बाद शेष विभिन्न जातियां व समुदाय, जो ज्यादातर आदिवासियों के गाँवों में रहते हैं, इन्हें ही आमतौर पर सदान के नाम से जाना जाता है। सदान इस क्षेत्र के पुराने गैर-जनजातीय सह-निवासी हैं। उनके पास एक समृद्ध परंपरा, संस्कृति और इतिहास है और उनकी भाषा को सदानी कहा जाता है। इसमें विशेष रूप से नागपुरी, कुरमाली, खोरठा, पंचपरगनिया आदि आते हैं।

इनकी संस्कृति प्रोटो-ऑस्ट्रोलॉयड, द्रविड़ और आर्य परंपराओं और मूल्यों का एक अद्वितीय मिश्रण है। अँग्रेज़ शासन में आदिवासी और सदान दोनों को ही अपनी आज़ादी से हाथ धोना पड़ा। इसका जवाब दोनों समुदायों ने दोनों अंग्रेजी शासन को भयंकर विरोध कर दिया। सदानों और आदिवासियों की एकता को तोड़ने के लिए अंग्रेजों ने फूट डालो और राज करो की नीति अपनायी। जिससे, ‘दिकू’ शब्द की प्रकृतिगत और सरल अवधारणा ही बदल गई। जबकि झारखंड के आदिवासियों के लिए ‘दिकू’ अज्ञात बाहरी लोग थे। ‘दिकू’ की इस नई अवधारणा ने 1831-33 के प्रसिद्ध ‘कोल विद्रोह’ का विनाश कर दिया।

यह समुदाय मौजूदा सरकार के नीतियों से त्रस्त है। इस समाज के लोगों का मानना है कि कई मुद्दों पर उनका उत्पीड़न हो रहा है। उनका यह भी कहना है कि उन्हें अपनी सभ्यता-संस्कृति को बचाने की कोशिश करने पर, फ़र्ज़ी केस लाद कर इन्हें परेशान किया जा रहा है।  ये अब महसूस महसूस करने लगे हैं कि रघुबर सरकार इन्हें परेशानियों के सिवाए कुछ नहीं दे सकती। इसलिए मूलवासी-सदान मोर्चा के अध्यक्ष के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल नेता प्रतिपक्ष हेमंत सोरेन के आवास पर उनसे मुलाक़ात की और अपनी पीड़ा बतायी। श्री प्रसाद ने कहा कि इस सरकार ने पिछड़ी जातियों की 27 प्रतिशत आरक्षण घटा कर 14 प्रतिशत कर दी और सात जिलों में तो यह शून्य है।

मसलन,  हेमंत सोरेन उनकी पीड़ा को सुनने के बाद उन्हें आश्वस्त किया कि वे उनके अधिकारों के प्रति प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने आगे कहा कि उनकी सरकार आते ही ऐसी तमाम मुद्दों पर निश्चित रूप से निष्पक्षता से कार्य करना उनकी प्राथमिकता होगी।   

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