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राष्ट्रीय ओबीसी मोर्चा

राष्ट्रीय ओबीसी मोर्चा अपनी मांगों को लेकर सड़क पर  

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राष्ट्रीय ओबीसी मोर्चा ने भाजपा सरकार पर लगाए कई आरोप   

‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ (ओबीसी), भारत सरकार द्वारा जातियों को वर्गीकृत करने के लिए प्रयुक्त एक सामूहिक शब्द है। अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों  के साथ-साथ भारत की जनसंख्या के कई सरकारी वर्गीकरण में से एक है। भारतीय संविधान में ओबीसी सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के रूप में वर्णित किया गया है। भारत सरकार का उनके सामाजिक और शैक्षिक विकास हेतु सार्वजनिक क्षेत्र के रोज़गार और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में 27% फ़ीसदी आरक्षण प्रदत्त किया है। 1985 में कल्याण के लिए एक अलग मंत्रालय – अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के संबंधित मामलों का निष्पादन करने लिये स्थापित किया गया था।

दिसंबर 2018 में आयी आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार, अन्य पिछड़ा वर्गों और ओबीसी के रूप में वर्गीकृत सभी उप-जातियों में केवल 25 फीसदी ही ओबीसी आरक्षण का 97% फायदा उठा लेती है, जबकि कुल ओबीसी जातियों में से 37 प्रतिशत जातियों का प्रतिनिधित्व शून्य है। 1 जनवरी 1979 को स्थापित दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग जिसे लोकप्रिय मंडल आयोग के रूप में जाना जाता है, इसके अध्यक्ष बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल ने दिसंबर 1980 में एक रिपोर्ट पेश की, जिसमें कहा गया है कि ओबीसी की जनसंख्या, जिसमें हिन्दू व गैर हिन्दू दोनों शामिल हैं, कुल आबादी का लगभग 52% है। 

झारखंड में इस संबंध में राष्ट्रीय ओबीसी मोर्चा अनुच्छेद 340 का हवाला देते हुए अपनी मांगों को लेकर मानसून सत्र के दौरान विधानसभा के समक्ष आंदोलनरत दिखे। राष्ट्रीय ओबीसी मोर्चा का कहना है कि उनके समुचित विकास से ही देश का विकास संभव है। इस मोर्चे ने मौजूदा सरकार पर आरोप लगाया है कि अनुच्छेद 15(4), 16(4), ओबीसी को शिक्षा व सरकारी नौकरियों में आरक्षण के प्रावधान निहित है, जबकि यह सरकार उन अनुशंसाओं को लगातार नजर अंदाज की है। दिलचस्प तथ्य यह है कि दुमका, प. सिहभूम, गुमला,सिमडेगा, लोहरदगा, खूंटी, लातेहार में आरक्षण शून्य है।  जिसकी वजह से इस वर्ग के युवा, छात्र, पुश्तैनी व्यवसायिक अशिक्षा, बेरोज़गारी जैसे खाई की और अग्रसर है।

इन्होंने यह भी आरोप लगाया है कि राज्य के 52 फीसदी ओबीसी को यह सरकार विकास नीति से बाहर रखने के लिए केवल नयी-नयी नीतियाँ बना रही है। उदाहरण में कहा है कि 52 फीसदी वाले इस समाज को झारखंड में मात्र 14 प्रतिशत ही आरक्षण का प्रावधान है। इसे बढाने के लिए यह मोर्चा 19 वर्षों से आन्दोलनरत है, जबकि भाजपा की सरकार झारखंड में 15 वर्षों तक शासन करने के बावजूद केवल टाल-मटोल करती रही है। बहरहाल सरकार से निवेदन है कि 52 प्रतिशत आरक्षण व आउट सोर्सिंग को बंद कर इसे जल्द से जल्द लागू करे अन्यथा परिणाम चौकाने वाले होंगे।    

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