Breaking News
Home / News / Jharkhand / साहूकार है हम! साहू जाति के झारखण्ड में होने के मायने
साहूकार प्रथा

साहूकार है हम! साहू जाति के झारखण्ड में होने के मायने

Spread the love

झारखंड के जाति व्यवस्था की इतिहास पर प्रकाश डालने पर पता चलता है कि, जाति व्यवस्था राज्य की विशिष्ट सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितयों की देन है। प्राचीन इतिहासकार डी.डी. कोसाम्बी, आर.एस. शर्मा, रोमिला थापर, सुवीरा जायसवाल आदि की जाति व्यवस्था सम्बन्धित व्याख्याओं और मान्यताओं को पढने से पता चलता है कि हरेक शासक वर्ग व साहूकार वर्ग ने समाज में पैदा हो रहे जाति व्यवस्था के अधिशेष को हड़पने के लिए एक औजार के रूप में इस्तेमाल किया है। वहीं जाति व्यवस्था कभी स्थिर चीज़ भी नहीं रही है, बल्कि जाति व्यवस्था में भी परिवर्तन आते रहे हैं। आज भी यदि देखा जाये तो आदिवासी-दलित-अल्पसंख्यक आबादी का बहुसंख्यक हिस्सा मज़दूर वर्ग में शामिल है।

झारखण्ड में जाति व्यवस्था यहाँ के आर्थिक-सामाजिक और राजनीतिक संघर्षों यानि वर्ग संघर्षों की ही एक विशिष्ट अभिव्यक्ति है। मौर्य, गुप्त साम्राज्य से लेकर सल्तनत और मुग़ल साम्राज्य तक और फिर औपनिवेशिक शासक वर्ग व साहूकार वर्ग से लेकर आज़ाद भारत के शासक वर्ग तक, हर नये शासक वर्ग ने जाति व्यवस्था को अपनाया और इसके साथ ही उत्पादन प्रणाली में जाति व्यवस्था के पदानुक्रम तौर पर परिवर्तन किये। 

इन जातियों में ध्रुवीकरण का पहलु नज़रन्दाज़ नहीं किया जा सकता। इसका उदाहरण वर्त्तमान में हम साहू समाज में देखते हैं। साहू गोत्र एक उपनाम है जो भारत और पाकिस्तान में पाया जाता है। साहू उपनाम वाले बिहार, झारखण्ड के लोग मुख्यता सौडिक, रौनियार, तेली जाति के होते हैं। अधिकतर साहू जाति पहले भी व्यवसाय का कार्य करते थे और अब भी करते हैं। झारखंड में आदिवासी-दलित-मूलवासियों का इस समुदाय से लम्बा वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है। यह भी उतना ही सत्य है कि यह समाज हमेशा शूद्रों यानि आदिवासी-दलित-मूलवासियों का हमेशा शोषण किया हैं और अब भी कर रहे हैं। यही वजह है कि भाजपा ने झारखण्ड में इस समुदाय से मुख्यमंत्री देकर अपनी राजनीति की आधारशिला रखी है। 

साहू जाति का इतिहास शराब व्यवसाय से भी रहा है, इनका पदार्पण झारखण्ड में बंगाल के रास्ते केवल महुआ व्यवसाय के लिए हुआ, जिससे शराब बनायी जाती है। आगे इन्होंने यहाँ के भोले-भाले आदिवासी-दलित-मूलवासियों को मुफ्त में शराब चखा कर आदि बनाया। कौन नहीं जानता इन्होंने आगे चल कर झारखण्ड के आदिवासी-मूलवासियों से एक पार्ट शराब के बदले एकड़ के एकड़ जमीने हड़पी। पूरे झारखण्ड आन्दोलन की मुख्य वजह यही तो थी -साहूकारी प्रथा हटाना। आज भी देखें तो झारखण्ड के अधिकांश शराब ठेकों की ठेकेदारी इसी जाति के लोगों को ही दी गयी है।

Check Also

लम्बी चुनाव प्रक्रिया

लम्बी चुनाव प्रक्रिया से झारखंड की व्यवस्था चरमराई 

Spread the loveझारखंड में पाँच चरणों में विधानसभा चुनाव संपन्न कराये जाने हैं, मुख्यमंत्री जी …

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.